Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.49
मूल श्लोक :
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
बुद्धियोग(समता) की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट है। अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि (समता) का आश्रय ले क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कर्मफल की चिन्ताओं से मुक्त शान्त मन से किया हुआ कर्म निश्चित रूप से चिन्तित क्षुब्ध मन से किए गये कर्म से श्रेष्ठतर होता है। इस श्लोक में प्रयुक्त बुद्धियोग शब्द से कुछ व्याख्याकारों को एक और नया योग गीता में उपदेश किया गया ज्ञात होता है। परन्तु मेरे अपने विचार के अनुसार ऐसा अर्थ खींचतान कर किया हुआ प्रतीत होता है। उपनिषदों में अन्तकरण की निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि तथा संकल्पात्मक वृत्ति को मन की संज्ञा दी गयी है। संदेह और विक्षेप की स्थिति में वृत्तियों को मन कहते हैं एकाग्रता निश्चय एवं शान्ति की स्थिति में अन्तकरण की वृत्ति को बुद्धि कहा जाता है। अत बुद्धियोग का अर्थ हुआ बुद्धि के निश्चित किये अर्थ में (कार्य में) दृढ़ता से स्थिर होना। निश्चय ही दृढ़ता मन का बुद्धि के अनुशासन में रहना तथा अन्तर्बाह्य परिस्थितियों का स्वामी होना बुद्धियोग के लक्षण हैं। जीवन के परम लक्ष्य को आँखों से ओझल किये बिना प्राप्त कर्तव्यों का पालन ही बुद्धियोग है।गीता की सामान्य प्रस्तावना जिसमें व्यक्तित्व का विघटन एवं वासनाक्षय के द्वारा उसके संगठन का विवेचन किया गया है के प्रकाश में बुद्धियोग का अर्थ यह हो सकता है साधक का जीवन में बुद्धि के अनुसार रहने का सतत् प्रयत्न मन को बुद्धि के अनुशासन में लाकर उसके निर्देशानुसार काम करने के प्रयत्न को बुद्धियोग कहते हैं। इस प्रकार पूर्वार्जित वासनाओं के क्षय द्वारा अहंकार का नाश होता है और उसके नाश का अर्थ है बुद्धियोग में स्थिति। अत यहाँ अर्जुन को बुद्धि की शरण में जाने का उपदेश दिया गया है।बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण करने में एक प्रबल कारण है। यदि मन की प्रवृत्तियों के अनुसार ही कर्म करते रहे तो चित्त में असंख्य विक्षेप तो उत्पन्न होते ही हैं परन्तु साथ ही नयीनयी वासनाओं का संचय भी होता है जिनका सघन आवरण आत्मस्वरूप पर पड़ता है। भगवान् ऐसे लोगों को कृपण कहते हैं। वास्तव में वे ही दीन हैं । इसके विपरीत बुद्धियोग में स्थित साधक निस्वार्थ भाव से कर्म करता हुआ वासनाओं के आवरण को नष्ट कर निर्मल मन से आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।अब समभाव में रहकर कर्तव्य पालन करने वाले को क्या फल मिलता है वह जानो
English Translation By Swami Sivananda
Far lower than the Yoga of wisdon is action, O Arjuna. Seek thou refuge in wisdom; wretched are they whose motive is the fruit.
Transliteration
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañjaya
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥअनुवाद
हे धनञ्जय! सकाम कर्म बुद्धियोग (समत्व बुद्धि) से अत्यंत निम्न है। इसलिए तुम समबुद्धि की शरण ग्रहण करो। कर्मफलों के हेतु बनने वाले (फल की इच्छा रखने वाले) लोग कृपण (अत्यंत दीन) होते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सकाम कर्म (फल की इच्छा से किए गए कार्य) की तुलना में बुद्धियोग (समत्व भाव) की श्रेष्ठता बताते हैं। वे अर्जुन को सलाह देते हैं कि वह परिणामों की चिंता से मुक्त होकर समबुद्धि की शरण ले। जो लोग केवल कर्मफलों की लालसा से कार्य करते हैं, उन्हें ‘कृपण’ या अत्यंत दीन कहा गया है क्योंकि वे अपने अमूल्य मानव जीवन को तुच्छ भौतिक लाभों में व्यर्थ कर देते हैं।
Translation
O Dhananjaya, fruitive action is by far inferior to the yoga of intelligence. Seek refuge in equanimity. Those who are motivated by the fruits of action are pitiable.
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes the superiority of acting with equanimity (buddhi-yoga) over acting for material rewards. He advises Arjuna to take refuge in this balanced state of consciousness, free from the anxiety of results. Those who constantly crave the fruits of their actions are described as ‘misers’ or pitiable, because they waste their human potential on temporary gains rather than spiritual liberation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दूरेण | अत्यंत / बहुत दूर |
| हि | निश्चय ही |
| अवरम् | निम्न कोटि का / तुच्छ |
| कर्म | सकाम कर्म |
| बुद्धियोगात् | बुद्धियोग से / समत्व बुद्धि से |
| धनञ्जय | हे अर्जुन |
| बुद्धौ | समबुद्धि में |
| शरणम् | आश्रय / शरण |
| अन्विच्छ | खोजो / ग्रहण करो |
| कृपणाः | कृपण / दीन |
| फलहेतवः | फल के हेतु वाले / फल की इच्छा रखने वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| dūreṇa | by far |
| hi | indeed |
| avaram | inferior |
| karma | action / fruitive work |
| buddhiyogāt | than the yoga of intelligence / equanimity |
| dhanañjaya | O conqueror of wealth |
| buddhau | in intelligence / equanimity |
| śaraṇam | refuge |
| anviccha | seek |
| kṛpaṇāḥ | misers / pitiable ones |
| phalahetavaḥ | those motivated by fruits of action |