Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.48
मूल श्लोक :
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यहाँ कर्मयोग का ही विशद् विवेचन किया गया है। इस श्लोकार्थ पर विचार करने से ज्ञात होगा कि अहंकार की पूर्ण निवृत्ति के बिना इस मार्ग में सफलता नहीं मिल सकती और इसकी निवृत्ति का उपाय है मन का समत्व भाव। इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं।कर्मयोगी के लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं कि सम भाव में रहकर वह कर्म करे परन्तु इस नित्य परिवर्तनशील जगत् में रहते हुये इस समभाव को दृढ़ करने का सतत प्रयत्न करे। इसके लिये उपाय है कर्मों के तात्कालिक फलों के प्रति संग (आसक्ति) का त्याग।कर्मों को कुशलतापूर्वक करने के लिए जिस संग को त्यागने के लिए यहाँ कहा गया है उसपर हम विचार करेंगे। इसके पूर्व के श्लोकों में श्रीकृष्ण ने जिन आसक्तियों का त्याग करने को कहा था वे सब संग शब्द से इंगित की गयी हैं अर्थात् विपरीत धारणायें झूठी आशायें दिवा स्वप्न कर्म फल की चिन्तायें और भविष्य में संभाव्य अनर्थों का भय इन सबका त्याग करना चाहिये। त्याज्य गुणों की इस सूची को देखकर किसी भी साधनरत सच्चे साधक को यह सब करना असम्भव ही प्रतीत होगा। परन्तु उपनिषदों के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर और अधिक विचार करने पर हम सरलता से इस गुत्थी को सुलझा सकेंगे।उपर्युक्त सभी कष्टप्रद धारणायें एवं गुत्थियां भ्रांति जनित अहंकार की ही हैं। यह अहंकार क्या है भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। अत अहंकारमय जीवन का अर्थ है मृत क्षणों की श्मशानभूमि अथवा काल के गर्भ में रहना जहाँ अनुत्पन्न भविष्य स्थित है। इनमें व्यस्त रहते हुये वर्तमान समय को हम खो देते हैं जो हमें कर्म करने और लक्ष्य पाने के लिये उपलब्ध होता है। वर्तमान में प्राप्त सुअवसररूपी धन का यह मूर्खतापूर्ण अपव्यय है जिसका संकेत व्यासजी इन शब्दों में करते है संग त्याग कर समत्व योग में स्थित हुये तुम कर्म करो।वर्तमान कीअग्नि में भूतभविष्य चिन्ता भय आशा इन सबको जलाकर कर्म करना स्फूर्ति और प्रेरणा का लक्षण है। इस प्रकार अहंकार के विस्मरण और कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है।कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति के आनन्द में निमग्न होकर कार्यरत कलाकार इस तथ्य का प्रमाण है। वैसे इसे समझने के लिए कोई महान कलाकार होने की आवश्यकता नहीं है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है।अहंकार को भूलकर जो कार्य किये जाते हैं उनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना। स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है। अत भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन की सभी परिस्थितियों में समान रहते हुये कर्म करने का उपदेश देते हैं।योगस्थ होकर किये कर्मों की तुलना में अन्य कर्मों के विषय में भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Perform action, O Arjuna, being steadfast in Yoga, abandoning attachment and balanced in success and failure. Evenness of mind is called Yoga.
Transliteration
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyateअनुवाद
हे धनंजय! आसक्ति को त्याग कर तथा सफलता और विफलता में समान भाव रखकर, योग में स्थित होकर अपने कर्मों को करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का मूल सिद्धांत समझाते हैं। वे कहते हैं कि कर्म करते समय फल की आसक्ति नहीं होनी चाहिए, चाहे कार्य में सफलता मिले या विफलता। मन की इसी समता और स्थिरता को ही वास्तविक ‘योग’ कहा गया है।
Translation
O Dhananjaya, perform your duties steadfast in yoga, having abandoned attachment, and having become equal in success and failure. This evenness of mind is called yoga.
Meaning
Lord Krishna explains the fundamental principle of Karma Yoga to Arjuna. He advises performing one’s duties without attachment to the results, remaining unperturbed by success or failure. This very equanimity and stability of mind is defined as true ‘yoga’.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| योगस्थः | योग में स्थित होकर |
| कुरु | करो |
| कर्माणि | कर्मों को |
| सङ्गम् | आसक्ति को |
| त्यक्त्वा | त्याग कर |
| धनञ्जय | हे धनंजय (अर्जुन) |
| सिद्धि-असिद्ध्योः | सफलता और विफलता में |
| समः | समान |
| भूत्वा | होकर |
| समत्वम् | समभाव (समानता) |
| योगः | योग |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yogasthaḥ | steadfast in yoga |
| kuru | perform |
| karmāṇi | duties |
| saṅgam | attachment |
| tyaktvā | having abandoned |
| dhanañjaya | O Dhananjaya (Arjuna) |
| siddhi-asiddhyoḥ | in success and failure |
| samaḥ | equal |
| bhūtvā | having become |
| samatvam | evenness of mind |
| yogaḥ | yoga |
| ucyate | is called |