श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.47

मूल श्लोक :

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कर्तव्यकर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

वेद प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार ईश्वरार्पण बुद्धि और निष्काम भाव से किये गये कर्म अन्तकरण को शुद्ध करते हैं। आत्मबोध के पूर्व चित्तशुद्धि होना अनिवार्य है। गीता में इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हुये विशद विवरण में वैयक्तिक और सामाजिक सभी कर्मों का समावेश कर लिया गया है जबकि वेदों में कर्म से तात्पर्य यज्ञयागादि धार्मिक विधियों से ही था।अपरिपक्व बुद्धि से तत्त्वज्ञान जैसा गम्भीर विषय समझ में नहीं आ सकता। पर्याप्त विचार किये बिना उपर्युक्त श्लोक का अर्थ असंभव ही प्रतीत होगा। अधिकसेअधिक कोई यह मान लेगा कि उस काल में दरिद्र को दरिद्र ही रखने में और धनवान को उन पर अत्याचार करने की धार्मिक अनुमति इस श्लोक में दी गयी हैं। केवल बौद्धिक विचार करने वाले व्यक्ति को फलासक्ति न रखकर कर्म करने का आदर्श अव्यावहारिक और असंभव प्रतीत होगा। परन्तु वही व्यक्ति अध्ययन के पश्चात् अपने कर्म क्षेत्र में इसका पालन करके देखे तो उसे यह ज्ञात होगा कि जीवन में वास्तविक सफलताओं को प्राप्त करने की यही एक मात्र कुंजी है।इसके पूर्व प्रेरणा का जीवन जीने की कला जो कर्मयोग के रूप में बतायी गयी थी उसी की शिक्षा यहाँ श्रीकृष्ण पुन अर्जुन को दे रहे हैं। अनुचित संकल्पविकल्प जीवन के विष हैं। जीवन में सभी असफलताओं का मूल मनस्थिरता के अभाव में निहित है जो सामान्यत भविष्य में संभाव्य हानि के भय की कल्पना मात्र का परिणाम होता है। हममें से अधिकांश लोग असफलता के भय से महान् कार्य को अपने हाथों में लेना ही स्वीकार नहीं करते और जो कोई थोड़े लोग ऐसा साहस करते भी हैं तो अल्पकाल के बाद निरुत्साहित होकर उस कार्य को अपूर्ण ही छोड़ देते हैं। इसका कारण एक ही हैमन की शक्ति का अपव्यय। इस अपव्यय के परिहार का एक मात्र उपाय है  किसी श्रेष्ठ आदर्श के प्रति सब कर्मों का समर्पण। प्रेरणायुक्त इन कर्मों की परिसमाप्ति गौरवमयी सफलता मेंं ही होती है। यह कर्म का सनातन नियम है।भविष्य का निर्माण सदैव वर्तमान में होता है। आगामी कल की फसल आज के जोतने और बीज बोने पर निर्भर है। किन्तु भविष्य में सम्भावित फसल की हानि की कल्पना करके ही यदि कोई कृषक भूमि जोतने और बीजारोपण के अवसरों को वर्तमान समय में खो देता है तो यह निश्चित है कि भविष्य में उसे कोई फसल मिलने वाली नहीं। उन्नत भविष्य के लिए वर्तमान समय का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्वक करना चाहिये। भूतकाल तो मृत है और भविष्य अभी अनुत्पन्न। वर्तमान में अकुशलता से कार्य करने पर व्यक्ति को भविष्य में किसी बड़ी सफलता की आशा नहीं करनी चाहिये।इस सुविदित और बोधगम्य मूलभूत सत्य को गीता की भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि तुम सफलता चाहते हो तो ऐसे मन से प्रयत्न कभी नहीं करो जो फल प्राप्ति की चिन्ता एवं भय से बिखरा हुआ हो। यहाँ कर्मफल से शास्त्र का क्या तात्पर्य है इसे सूक्ष्म विचार से समझना आवश्यक और लाभप्रद होगा। सम्यक् विचार करने से यह ज्ञात होगा कि वास्तव में कर्मफल स्वयं कर्म से कोई भिन्न वस्तु नहीं है। वर्तमान में किया गया कर्म ही भविष्य में फल के रूप में प्रकट होता है। वास्तविकता यह है कि कर्म की समाप्ति अथवा पूर्णता उसके फल में ही है जो उससे भिन्न नहीं है। अत कर्मफल की चिन्ता करके उसी में डूबे रहने का अर्थ है शक्तिशाली गतिशील वर्तमान से पलायन करना और अनुत्पन्न भविष्य की कल्पना में बने रहना  संक्षेप में भगवान् का आह्वान है कि मनुष्य को व्यर्थ की चिन्ताओं में प्राप्त समय को नहीं खोना चाहिये वरन् बुद्धिमत्तापूर्वक उसका सदुपयोग करना चाहिये। भविष्य का निर्माण अपने आप होगा और कर्मयोगी को प्राप्त होगी श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति।निष्कर्ष यह निकलता है कि अर्जुन के लिये इस युद्ध का प्रयोजन धर्म पालन जैसा श्रेष्ठ आदर्श है यह समझकर उसे अपनी पूरी योग्यता से कर्म में प्रवृत्त होना चाहिये। प्रेरणायुक्त कर्मों का सुफल अवश्य मिलेगा और उसके साथ ही चित्त शुद्धि के रूप में आध्यात्मिक फल भी प्राप्त होगा।एक सच्चा कर्मयोगी बनने के लिये इस श्लोक में चार नियम बताये गये हैं। जो यह समझता है कि  (क) कर्म करने मात्र में मेरा अधिकार है  (ख) कर्मफल की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है  (ग) किसी कर्म विशेष के एक निश्चित फल का आग्रह या उद्देश्य मन में नहीं होना चाहिये  और (घ) इन सबका निष्कर्ष यह नहीं कि अकर्म में प्रीति हो वही व्यक्ति वास्तव में कर्मयोगी है। संक्षेप में इस उपदेश का प्रयोजन मनुष्य को चिन्ता मुक्त बनाकर कर्म करते हुये दैवी आनन्द में निमग्न रहकर जीना सिखाना है। कर्म करना ही उसके लिये सबसे बड़ा पुरस्कार और उपहार है  श्रेष्ठ कर्म करने के सन्तोष और आनन्द में वह अपने आपको भूल जाता है। कर्म है साधन और आत्मानुभूति है साध्य।ईश्वर का स्मरण करते हुये सभी बाह्य चुनौतियों का तत्परता से सामना करते हुये मनुष्य सरलतापूर्वक शान्ति और वासना क्षय द्वारा चित्त की शुद्धि प्राप्त कर सकता है। जितनी अधिक मात्रा में चित्त में शुद्धि होगी उतनी ही अधिक आत्मानुभूति उसे सुलभ होगी।यदि कर्मफल की आसक्ति रखकर कर्म न करें तो फिर उन्हें कैसे करना चाहिये इसका उत्तर है

English Translation By Swami Sivananda

Thy right is to work only, but never with its fruits; let not the fruits of action be thy motive, nor let thy attachment be to inaction.

Transliteration

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana
mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo'stvakarmaṇi

अनुवाद

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मों के फल का हेतु मत बनो, और तुम्हारी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।

भावार्थ

यह श्लोक निष्काम कर्मयोग का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है। भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य का नियंत्रण केवल उसके कर्मों पर है, उनके परिणामों पर नहीं। इसलिए, फल की इच्छा के बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और साथ ही कर्म से भागने की प्रवृत्ति से भी बचना चाहिए।

Translation

You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty.

Meaning

This verse presents the core principle of Nishkama Karma Yoga or selfless action. Lord Krishna explains to Arjuna that a person only has control over their actions, not the outcomes. Therefore, one should perform their duty without attachment to the results, while also avoiding the tendency to escape from action altogether.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कर्मणिकर्म में
एवही
अधिकारःअधिकार
तेतुम्हारा
मानहीं
फलेषुफलों में
कदाचनकभी
मामत
कर्मफलहेतुःकर्मों के फल का कारण
भूःहो
मान
तेतुम्हारी
सङ्गःआसक्ति
अस्तुहो
अकर्मणिकर्म न करने में

Word by word

WordMeaning
karmaṇiin prescribed duty
evaonly
adhikāraḥright
teyour
mānever
phaleṣuin the fruits
kadācanaat any time
mānever
karmaphalahetuḥcause of the fruits of action
bhūḥbe
mānever
teyour
saṅgaḥattachment
astulet there be
akarmaṇiin inaction