श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.46

मूल श्लोक :

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जलराशि का जो सुन्दर दृष्टान्त यहाँ दिया गया है वह सन्दर्भ को देखते हुये अत्यन्त समीचीन है। भीषण गर्मियों के दिनों में सरिताओं के सूख जाने पर समीप के किसी कुएँ से ही जल लेने लोगों को जाना पड़ता है। यद्यपि पैरों के नीचे पृथ्वी के गर्भ में जल स्रोत रहता है परन्तु वह उपयोग के लिये उपलब्ध नहीं होता। वर्षा ऋतु में सर्वत्र नदियों में बाढ़ आने पर छोटेछोटे जलाशय उसी में समा जाते हैं और तब उनका अलग से न अस्तित्व होता है और न प्रयोजन।उसी प्रकार  जब तक मनुष्य अपने आनन्दस्वरूप को पहचानता नहीं तब तक मोहवश विषयों में ही वह सुख खोजा करता है। उस समय वेद अर्थात् कर्मकाण्ड उसे अत्यन्त उपयोगी प्रतीत होते हैं क्योंकि उसमें स्वर्गादि सुख पाने के अनेक साधन बताये गये हैं। परन्तु जब एक जिज्ञासु साधक उपनिषद् प्रतिपादित आनन्दस्वरूप आत्मा का अपरोक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब उसे कर्मकान्ड में कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। उपभोगजन्य सभी छोटेछोटे सुख उसके आनन्दस्वरूप में ही समाविष्ट होते हैं।इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि व्यास जी द्वारा यहाँ वेदों के कर्मकाण्ड की निन्दा की गयी है। जो अविवेकी लोग साधन को ही साध्य समझ लेते हैं और अनन्त की प्राप्ति की आशा अनित्य कर्मों के द्वारा करते हैं गोपाल कृष्ण उनको इस प्रकार से प्रताड़ित कर रहे हैं  फलासक्ति न रखकर किये गये कर्मों से मनुष्य का व्यक्तित्व विकसित होता है और ऐसे शुद्ध अन्तकरण वाले मनुष्य को अनन्त असीम आत्मतत्त्व का अनुभव सहज सुलभ हो जाता है। तत्पश्चात् उसे अनित्य सुखों का कोई आकर्षण नहीं रह जाता।वेद हमें अपने ही शुद्ध चैतन्यस्वरूप का बोध कराते हैं। जब तक अविद्यायुक्त अहंकार का अस्तित्व है तब तक वेदाध्ययन की आवश्यकता अपरिहार्य है। आत्मबोध के होने पर उस ज्ञानी पुरुष के कारण वेदों का भी प्रामाण्य सिद्ध होता है। गणित की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने पर उस व्यक्ति को पहाड़े रटने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि उसके पूर्ण ज्ञान में इस प्रारम्भिक ज्ञान का समावेश रहता है। जहाँ तक तुम्हारा सम्बन्ध है

English Translation By Swami Sivananda

To the Brahmana who has known the Self, all the Vedas are of as much use as is a reservoir of water in a place where there is a flood.

Transliteration

yāvānartha udapāne sarvataḥ saṃplutodake
tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ

अनुवाद

सब ओर से जल से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे कुएं का जितना प्रयोजन रह जाता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।

भावार्थ

भगवान कृष्ण समझाते हैं कि वेदों में वर्णित कर्मकांड और उनके फल एक छोटे कुएं के समान हैं, जो सीमित आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसके विपरीत, आत्मज्ञान या ब्रह्म का साक्षात्कार एक विशाल, लबालब भरे हुए जलाशय के समान है जो एक साथ सभी उद्देश्यों को पूरा कर देता है। इसलिए, जिस ज्ञानी पुरुष ने परम सत्य को जान लिया है, उसके लिए वेदों के सकाम कर्मों का कोई विशेष प्रयोजन नहीं रह जाता।

Translation

As much purpose as a small well serves when there is a vast body of water everywhere, that much purpose all the Vedas serve for a Brahmana who possesses true knowledge.

Meaning

Lord Krishna explains that the rituals and rewards mentioned in the Vedas are like a small well, useful only for specific, limited purposes. However, self-realization or the knowledge of Brahman is like a vast, overflowing lake that fulfills all needs at once. Therefore, a realized soul who has attained the ultimate truth no longer depends on limited Vedic rituals, as their ultimate purpose has already been achieved.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यावान्जितना
अर्थःप्रयोजन
उदपानेछोटे कुएं में
सर्वतःसब ओर से
संप्लुतोदकेजल से भरे हुए विशाल जलाशय के होने पर
तावान्उतना ही
सर्वेषुसभी
वेदेषुवेदों में
ब्राह्मणस्यब्रह्म को जानने वाले का
विजानतःतत्त्वज्ञानी का

Word by word

WordMeaning
yāvānas much
arthaḥpurpose
udapānein a well
sarvataḥeverywhere
samplutodakein a great reservoir of water
tāvānthat much
sarveṣuin all
vedeṣuin the Vedas
brāhmaṇasyaof a Brahmana (knower of Brahman)
vijānataḥof one who knows