Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.45
मूल श्लोक :
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं हे अर्जुन तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा निर्द्वन्द्व हो जा निरन्तर नित्य वस्तुमें स्थित हो जा योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विभिन्न अनुपातों में सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के संयोग से प्राणियों का निर्माण हुआ है। अन्तकरण (मन और बुद्धि) इन तीन गुणों का ही कार्य है। तीन गुणों के परे जाने का अर्थ है मन के परे जाना। तांबा जस्ता और टिन से निर्मित किसी मिश्र धातु का पात्र बना हो और यदि उसमें से इन तीनों धातुओं को विलग करने के लिये कहा जाय तो उसका अर्थ उस पात्र को ही नष्ट करना होगा। उपनिषद् साधक को मन के परे जाने का उपदेश देते हैं जिससे साधक को आत्मस्वरूप से ईश्वर का परिचय होगा। उपनिषदों के इस स्पष्ट उपदेश को यथार्थ में नहीं समझने के कारण अनेक हिन्दू लोग अपने धर्म से अलग हो गये और इसलिये गीता में पुनर्जागरण का आवाहन किया गया। औपनिषदिक अर्थ को ही यहां दूसरे शब्दों में कहा अर्जुन तुम त्रिगुणातीत बनो।यदि कोई चिकित्सक किसी रोगी के लिये ऐसी औषधि लिख देता है जो विश्व में कहीं भी उपलब्ध न हो तो उस चिकित्सक का लिखा हुआ उपचार व्यर्थ है। इसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार के लिये त्रिगुणों के परे जाने का उपदेश भले ही श्रेष्ठ हो परन्तु कौन सी साधना के अभ्यास से उसे सम्पादित किया जाय इसका स्पष्टीकरण यदि नहीं किया गया है तो वह उपदेश निरर्थक है। ज्ञान क्रिया और निष्क्रियता ये क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण के लक्षण हैं।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में त्रिगुणों के ऊपर उठकर असीम आनन्द में स्थित होने की साधना बतायी गयी है। पूर्व उपदिष्ट समत्व भाव का ही उपदेश यहाँ दूसरे शब्दों में किया गया है।परस्पर भिन्न एवं विपरीत लक्षणों वाले सुखदुख शीतउष्ण लाभहानि इत्यादि जीवन के द्वन्द्वात्मक अनुभव हैं। इन सब में समभाव में रहने का अर्थ ही निर्द्वन्द्व होना है इनसे मुक्त होना है। यही उपदेश श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहे हैं। नित्यसत्त्वस्थ तीनों गुणों में सत्व गुण सूक्ष्मतम एवं स्वभाव से शुद्ध है तथापि शोकात्मक रजोगुण और मोहात्मक तमोगुण के सम्बन्ध से उसमें अशुद्धि भी आ जाती है। मोह का अर्थ है वस्तु को यथार्थ रूप में न पहचानना (आवरण)। जिसके कारण वस्तु का अनुभव किसी अन्य रूप मे ही होता है जिसे विक्षेप कहते हैं और जिसका परिणाम हैशोक। अत सत्वगुण में स्थित होने का अर्थ विवेकजनित शान्ति में स्थित होना है। सत्त्वस्थ बनने के लिए सतत् सजग प्रयत्न की अपेक्षा है। निर्योगक्षेमयहाँ योग का अर्थ है अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम हैक्षेम। मनुष्य के सभी प्रयत्न योग और क्षेम के लिये होते हैं। अत इन दो शब्दों में विश्व के सभी प्राणियों के कर्म समाविष्ट हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित कर्मों का निर्देश योग और क्षेम के द्वारा किया गया है। मनुष्य की चिन्ताओं और विक्षेपों का कारण भी ये दो ही हैं। निर्योगक्षेम बनने का अर्थ है इन दोनों को त्याग देना जिससे चिन्ताओं से मुक्ति तत्काल ही मिलती हैं।निर्द्वन्द और निर्योगक्षेम बनने का उपदेश देना सरल है किन्तु साधक के लिये तत्त्वज्ञान का उपयोग तभी है जब इस ज्ञान को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि का भी उपदेश दिया गया हो। इस श्लोक में ऐसी विधि का निर्देश आत्मवान भव इन शब्दों में किया गया है। द्वन्द्वों तथा योगक्षेम के कारण उत्पन्न दुख और पीड़ा केवल तभी सताते हैं जब हमारा तादात्म्य शरीर मन और बुद्धि के साथ होकर अहंकार और स्वार्थ की अधिकता होती है।इन अनात्म उपाधियों के साथ विद्यमान तादात्म्य को छोड़कर इनसे भिन्न अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप के प्रति सतत जागरूक रहने का अभ्यास ही आत्मवान अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होने का उपाय है। इसकी सिद्धि होने पर अहंकार नष्ट हो जाता है और वह साधक त्रिगुणों के परे आत्मा में स्थित हो जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुष को वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। वास्तव में ज्ञानी पुरुष के होने के कारण वेदवाक्यों का प्रामाण्य सिद्ध होता है।यदि वैदिक यज्ञों के फलों की कामना त्यागनी चाहिये तो उनका अनुष्ठान किस लिये करें इसका उत्तर है
English Translation By Swami Sivananda
The Vedas deal with the three attributes (of Nature); be thou above these three attributes. O Arjuna, free yourself from the pairs of opposites, and ever remain in the ality of Sattva (goodness), freed from (the thought of) acisition and preservation, and be established in the Self.
Transliteration
traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna
nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavānअनुवाद
हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के कार्यरूप संसार के विषय में हैं। तुम इन तीनों गुणों से रहित हो जाओ। द्वन्द्वों से मुक्त, नित्य सत्त्वगुण में स्थित, योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) की चाह से रहित तथा आत्मपरायण बनो।
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को वेदों के सकाम कर्मकाण्ड से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं, जो मुख्य रूप से प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) और भौतिक फलों से संबंधित हैं। वे अर्जुन को सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों से मुक्त होने और अप्राप्त को पाने (योग) तथा प्राप्त की रक्षा (क्षेम) करने की चिंता छोड़ने के लिए कहते हैं। शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होकर ही मनुष्य वास्तविक शांति और मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
Translation
The Vedas deal with the subject of the three modes of material nature. O Arjuna, become free from these three modes. Be free from dualities, eternally fixed in purity, free from the desire for acquisition and preservation, and established in the Self.
Meaning
Lord Krishna advises Arjuna to rise above the ritualistic portions of the Vedas, which primarily deal with the three modes of material nature (Sattva, Rajas, and Tamas) and material rewards. He encourages him to transcend worldly dualities like joy and sorrow, and to abandon the anxiety of acquiring and protecting possessions (yoga and kshema). By becoming firmly established in the pure spiritual self, one attains true liberation and peace.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| त्रैगुण्यविषयाः | तीनों गुणों के विषय वाले |
| वेदाः | वेद |
| निस्त्रैगुण्यः | तीनों गुणों से रहित |
| भव | हो जाओ |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| निर्द्वन्द्वः | द्वन्द्वों से मुक्त |
| नित्यसत्त्वस्थः | नित्य सत्त्वगुण में स्थित |
| निर्योगक्षेमः | योग और क्षेम की चिंता से रहित |
| आत्मवान् | आत्मपरायण |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| traiguṇyaviṣayāḥ | dealing with the three modes of material nature |
| vedāḥ | the Vedas |
| nistraiguṇyaḥ | free from the three modes |
| bhava | be |
| arjuna | O Arjuna |
| nirdvandvaḥ | free from dualities |
| nityasattvasthaḥ | eternally fixed in purity |
| niryogakṣemaḥ | free from the desire for gain and preservation |
| ātmavān | established in the Self |