Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.44
मूल श्लोक :
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
महर्षि व्यास ऐसे पहले साहसी क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अपने काल में अत्यन्त शोचनीय पतन की स्थिति से हिन्दू संस्कृति का पुनरुत्थान किया। क्रान्ति का वह ग्रन्थ गीता है जिसकी रचना उन्होंने की। अपने काल की स्थितियों की उनके द्वारा की गयी तीव्र आलोचना भगवान् के इन शब्दों से स्पष्ट होती है जहां श्रीकृष्ण वेदों के कर्मकाण्ड को पुष्पिता वाणी कहते हैं। कर्मकाण्ड की तीव्र आलोचना करने में व्यास जी के साहस को समझने के लिये हमें उस काल के पुरोगामी पारम्परिक वातावरण की कल्पना करनी होगी हमें मानसिक रूप से उस काल में रहना होगा।वेदों का कर्मकाण्ड उन लोगों के लिए है जो विषयोपभोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं कर्मफल पाने की इच्छा और चिन्ता के कारण जिनकी सदसद् विवेक की क्षमता खो गयी है। सर्वोच्च साध्य को भूलकर साधनभूत कर्मों में ही वे लिप्त रहते हैं।वेदोक्त कर्मों को अत्यन्त परिश्रमपूर्वक करना पड़ता है तब मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग के रूप में उनका फल प्राप्त होता है जहाँ अलौकिक विषयों का उपभोग किया जा सकता है। इन सब प्रयत्नों में कामनाओं और चिन्ताओं आदि के कारण व्यक्तित्व के विकास के लिये अवसर नहीं मिलता इसलिये व्यास जी का विचार है कि अध्यात्म की दृष्टि से ये सकाम कर्म निरर्थक हैं। कर्मकाण्ड में आसक्त पुरुष जीवन के परम साध्य को भूलकर साधन में ही फंसा रह जाता है।अनन्तस्वरूप परम सत्य के प्रतिपादक के रूप में श्रीकृष्ण उन लोगों की हँसी उड़ाते हैं जो साधन को ही साध्य मानने की त्रुटि करते हैं। कर्मकाण्ड में ही उपदिष्ट केवल कर्तव्य कर्म के पालन से चित्त शुद्धि एवं एकाग्रता प्राप्त होती है और इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करने की योग्यता पाकर उपनिषदों में निरूपित निदिध्यासन के द्वारा आत्मा का अपरोक्ष अनुभव प्राप्त होता है जो जीवन का वास्तविक साध्य है। कर्म में ही रत पुरुषों को जीवन में कभी शान्ति नहीं मिलती।अविवेकी कामी पुरुषों को क्या फल मिलता है भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
For those who are attached to pleasure and power, whose minds are drawn away by such teaching, ï1thatï1 determinate reason is not formed which is steadily bent on meditation and Samadhi (superconscious state).
Transliteration
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyateअनुवाद
जो लोग भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं, और जिनका मन उन वाणियों द्वारा हर लिया गया है, उनकी समाधि में निश्चयात्मिका बुद्धि स्थापित नहीं होती है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण भौतिक सुखों और शक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्ति के परिणामों को समझाते हैं। जब किसी व्यक्ति का मन सांसारिक पुरस्कारों के लिए वेदों के पुष्पित वादों द्वारा मोहित हो जाता है, तो वह अपना आध्यात्मिक लक्ष्य खो देता है। परिणामस्वरूप, आत्म-साक्षात्कार या स्थिर ध्यान (समाधि) प्राप्त करने के लिए आवश्यक दृढ़ निश्चय उनके मन में स्थापित नहीं हो पाता है।
Translation
For those who are attached to enjoyment and opulence, and whose minds are carried away by such words, a resolute intellect is not established in samadhi.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the consequences of being overly attached to material pleasures and power. When a person’s mind is captivated by the flowery promises of the Vedas for worldly rewards, they lose their spiritual focus. Consequently, they cannot develop the resolute determination required to attain self-realization or steady meditation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भोग | भोग |
| ऐश्वर्य | ऐश्वर्य |
| प्रसक्तानाम् | में आसक्त लोगों की |
| तया | उस (वाणी) के द्वारा |
| अपहृत | हर लिया गया है |
| चेतसाम् | जिनका मन |
| व्यवसायात्मिका | निश्चयात्मिका |
| बुद्धिः | बुद्धि |
| समाधौ | समाधि में |
| न | नहीं |
| विधीयते | स्थापित होती है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| bhoga | enjoyment |
| aiśvarya | opulence |
| prasaktānām | of those who are attached |
| tayā | by that |
| apahṛta | stolen away |
| cetasām | of those whose minds |
| vyavasāyātmikā | resolute |
| buddhiḥ | intellect |
| samādhau | in samadhi |
| na | not |
| vidhīyate | is established |