श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.4

मूल श्लोक :

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अर्जुन बोले  हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अर्जुन का लक्ष्य भ्रष्ट करने वाला कायरतापूर्ण तर्क किसी अविवेकी को ही उचित प्रतीत हो सकता है। अर्जुन के ये तर्क उस व्यक्ति के लिये अर्थशून्य हैं जो मन के संयम को न खोकर परिस्थिति को ठीक प्रकार से समझता है। उसके लिये ऐसी परिस्थितियाँ कोई समस्या नहीं उत्पन्न करतीं। वास्तव में देखा जाय तो यह युद्ध दो व्यक्तियों के मध्य वैयत्तिक वैमनस्य के कारण नहीं हो रहा है। इस समय पाण्डव सैन्य से पृथक् अर्जुन का कोई अस्तित्व नहीं है और न ही भीष्म और द्रोण पृथक् अस्तित्व रखते हैं। वे कौरवों की सेना के ही अंग हैं। किन्हीं सिद्धान्तों के कारण ही ये दोनों सेनायें परस्पर युद्ध के लिये खड़ी हुई हैं। कौरव अधर्म की नीति को अपनाकर युद्ध के लिये तत्पर हैं तो दूसरी ओर पाण्डव हिन्दूशास्त्रों में प्रतिपादित धर्म नीति के लिये युद्धेक्षु हैं।धर्म के श्रेष्ठ पक्ष होने तथा दोनों सेनाओं द्वारा लोकमत की अभिव्यक्ति के कारण अर्जुन को व्यक्तिगत आदर या अनादर अनुभव करने का कोई अधिकार नहीं था और न ही उसे यह अधिकार था कि अधर्म के पक्षधरों में से किसी व्यक्ति विशेष को सम्मान या असम्मान देने के लिये वह आग्रह करे। इस दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को न देखकर अर्जुन स्वयं को एक प्रथक् व्यक्ति समझता है और उसी अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को देखता है। अर्जुन अपने आप को द्रोण के शिष्य और भीष्म के पौत्र के रूप में देखता है जबकि गुरु द्रोण और पितामह भीष्म भी अर्जुन को देख रहे थे परन्तु उनके मन में इस प्रकार का कोई भाव नहीं आता है क्याेंकि उन्हांेने अपने व्यक्तित्व को भूलकर अपना सम्पूर्ण तादात्म्य कौरव पक्ष के साथ स्थापित कर लिया था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का अहंकार ही उसकी मिथ्या धारणाओं और संभ्रम का कारण था।गीता के इस भाग पर मैंने देश के कई प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ विचार विमर्श किया और यह पाया कि वे अर्जुन के तर्क को उचित और न्यायपूर्ण मानते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यह अत्यन्त सूक्ष्म विषय है जिसका निर्णय होना परम आवश्यक है। संभवत व्यास जी ने यह विचार किया हो कि भावी पीढ़ियों के दिशा निर्देश के लिये इस गुत्थी को हिन्दू तत्त्वज्ञान के द्वारा सुलझाया जाये। जितना ही अधिक होगा तादात्म्य छोटेसे मैं  परिच्छिन्न अहंकार के साथ हमारी उतनी ही अधिक समस्यायॆं और संभ्रम हमारे जीवन में आयेंगे। जब यह अहं व्यापक होकर किसी सेना आदर्श राष्ट्र अथवा युग के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तो नैतिक दुर्बलता आदि का क्षय होने लगता है। पूर्ण नैतिक जीवन केवल वही व्यक्ति जी सकता है जिसने अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचान लिया है जो एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी एवं समस्त नाम रूपों में व्याप्त है। आगे हम देखेंगे कि भगवान् श्रीकृष्ण इस सत्य का उपदेश अर्जुन के मानसिक रोग के निवारणार्थ उपचार के रूप में करते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

Arjuna said  How, O Madhusudana, shall I fight in battle with arrows against Bhishma and Drona, who are fit to be worshipped, O destroyer of enemies?

Transliteration

arjuna uvāca
kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṃkhye droṇaṃ ca madhusūdana
iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana

अनुवाद

अर्जुन ने कहा — हे मधुसूदन! हे अरिसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय व्यक्तियों के विरुद्ध बाणों से कैसे युद्ध करूँगा?

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के समक्ष अपनी दुविधा और शोक व्यक्त कर रहे हैं। वे कहते हैं कि भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य उनके लिए अत्यंत पूजनीय हैं। ऐसे आदरणीय गुरुजनों और संबंधियों पर बाण चलाना उनके लिए नैतिक रूप से असंभव है, भले ही वे शत्रु पक्ष में क्यों न खड़े हों।

Translation

Arjuna said: O Madhusudana, O destroyer of enemies, how shall I fight with arrows in battle against Bhishma and Drona, who are worthy of worship?

Meaning

In this verse, Arjuna expresses his deep moral dilemma and grief to Lord Krishna. He points out that grandsire Bhishma and teacher Drona are highly venerable figures to him. He feels it is morally impossible to shoot arrows at such respected elders and teachers, even if they are standing on the enemy’s side.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अर्जुनःअर्जुन
उवाचने कहा
कथम्कैसे
भीष्मम्भीष्म के विरुद्ध
अहम्मैं
संख्येयुद्ध में
द्रोणम्द्रोण के विरुद्ध
चऔर
मधुसूदनहे मधुसूदन
इषुभिःबाणों से
प्रतियोत्स्यामियुद्ध करूँगा
पूजार्हौपूजनीय
अरिसूदनहे शत्रुओं के नाशक

Word by word

WordMeaning
arjunaḥArjuna
uvācasaid
kathamhow
bhīṣmamagainst Bhishma
ahamI
saṃkhyein battle
droṇamagainst Drona
caand
madhusūdanaO Madhusudana
iṣubhiḥwith arrows
pratiyotsyāmishall fight against
pūjārhauworthy of worship
arisūdanaO destroyer of enemies