श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.39

मूल श्लोक :

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पार्थ यह समबुद्धि पहले सांख्ययोगमें कही गयी अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर देगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जिस प्रामाणिक विचार एवं युक्ति के द्वारा पारमार्थिक सत्य का ज्ञान होता है उसे सांख्य कहते हैं जिसका उपदेश भगवान् प्रारम्भ में ही कर चुके हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करने से शोकमोह रूप संसार की पूर्ण निवृत्ति हो जाती है। अब श्रीकृष्ण कर्मयोग अथवा बुद्धियोग के विवेचन का आश्वासन अर्जुन को देते हैं।अनेक लोग कर्म के नियम को भूलवश भाग्यवाद समझ लेते हैं  किन्तु कर्म का नियम हिन्दू धर्म का एक आधारभूत सिद्धान्त है और इसलिये हिन्दू जीवन पद्धति का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिये इस नियम का यथार्थ ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। यदि एक वर्ष पूर्व मद्रास में श्री रमण राव के किये अपराध के लिये आज मुझे दिल्ली में न्यायिक दण्ड मिलता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उस अपराधी रमण राव और आज के सन्त चिन्मय में कुछ समानता होनी चाहिये  कानून के लम्बे हाथ यह पहचान कर कि अपराधी रमण राव ही चिन्मय है दिल्ली पहुँचकर मुझे दण्ड देते हैं इसी प्रकार प्रकृति का न्याय अकाट्य है पूर्ण है। इसलिये हिन्दू मनीषियों ने यह स्वीकार किया कि वर्तमान में हम जो कष्ट भोगते हैं उनका कारण भूतकाल में किसी देश विशेष और देहविशेष में किये हुए अपराध ही हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्वकाल का पापी और वर्तमान का कष्ट भोगने वाला कोई एक ही होना चाहिये। इसी को शास्त्र में जीव (मन और बुद्धि) कहा है।इच्छापूर्वक किया गया प्रत्येक कर्म कर्त्ता के मन पर अपना संस्कार छोड़ता जाता है जो कर्त्ता के उद्देश्य के अनुरूप ही होता है। इन संस्कारों को ही वासना कहते हैं जिनकी निवृत्ति के लिये प्रत्येक जीव विशिष्ट देश काल और परिस्थिति में जन्म लेता है। पूर्व संचित कर्मों के अनुसार सभी जीवों को दुख कष्ट आदि भोगने पड़ते हैं। मन पर पापों के चिहनांकन पश्चात्ताप पूरित क्षणों में अश्रुजल से ही प्रच्छालित किये जा सकते हैं। परिस्थितियाँ मनुष्य को रुलाती नहीं वरन् उसकी स्वयं की पापपूर्ण प्रवृत्तियाँ ही शोक का कारण होती हैं। शुद्धांन्तकरण वाले व्यक्ति के लिये फिर दुख का कोई निमित्त नहीं रह जाता।हमारे पास किसी संगीत का ध्वनिमुद्रित रेकार्ड होने मात्र से हम संगीत नहीं सुन सकते। जब रेकार्ड प्लेयर पर उसे रखकर सुई का स्पर्श होता है तभी संगीत सुनाई पड़ता है। इसी प्रकार मन में केवल वासनायें होने से ही दुख या सुख का अनुभव नहीं होता  किन्तु अहंकार की सूई का स्पर्श पाकर बाह्य जगत् में जब वे कर्म के रूप में व्यक्त होती हैं तभी विविध प्रकार के फलों की प्राप्ति का अनुभव होता है।पूर्व श्लोक में वर्णित समभाव में स्थित हुआ पुरुष सुखदुख लाभहानि और जयपराजय रूपी द्वन्द्वों से ऊपर उठकर निजानन्द में रहता है। जिस मात्रा में शरीर मन और बुद्धि के साथ हमारा तादात्म्य निवृत्त होता जायेगा उसी मात्रा में यह कर्त्तृत्व का अहंकार भी नष्ट होता जायेगा  और अन्त में अहंकार के अभाव में किसके लिये कर्मफल बाकी रहेंगे  अर्थात् कर्म और कर्मफल सभी समाप्त हो जाते हैं।गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त कोई नया और मौलिक नहीं था। उन्होंने ईसा के जन्म के पाँच हजार वर्ष पूर्व प्राचीन सिद्धांत का केवल नवीनीकरण करके मृतप्राय धर्म को पुनर्जीवित किया जो सहस्रों वर्षों पूर्व आज भी हमारे लिये आनन्द का संदेश लिये खड़ा है।

English Translation By Swami Sivananda

This, which has been taught to thee, is wisdon concerning Sankhya. Now listen to wisdom concerning Yoga, endowed with which, O Arjuna, thou shalt cast off the bonds of action.

Transliteration

eṣā te'bhihitā sāṃkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu
buddhyāyukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi

अनुवाद

हे पार्थ! यह ज्ञान तुम्हारे लिए सांख्य (ज्ञान योग) के विषय में कहा गया है। अब तुम इसे योग (कर्म योग) के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बंधन को पूरी तरह से काट दोगे।

भावार्थ

पिछले श्लोकों में भगवान कृष्ण ने आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का वर्णन किया, जो सांख्य दर्शन (ज्ञान योग) है। अब वे कर्म योग की ओर बढ़ते हैं, जो इस ज्ञान का व्यावहारिक रूप है। फल की आसक्ति के बिना कर्म करने से मनुष्य कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।

Translation

O Partha, this knowledge has been declared to you in the analytical study (Sankhya). Now listen to this in terms of Yoga (selfless action), endowed with which understanding you will cast off the bondage of action.

Meaning

In the preceding verses, Lord Krishna explained the eternal nature of the soul and the temporary nature of the body, which constitutes Sankhya philosophy. Now, He transitions to Karma Yoga, the practical application of this knowledge through selfless action. By acting without attachment to the fruits of one’s work, a person can break free from the cycle of karmic bondage.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
एषायह
तेतुम्हारे लिए
अभिहिताकही गई है
सांख्येसांख्य दर्शन में
बुद्धिःज्ञान
योगेकर्म योग में
तुअब
इमाम्इसे
शृणुसुनो
बुद्ध्याबुद्धि से
युक्तःयुक्त होकर
ययाजिससे
पार्थहे पृथा पुत्र अर्जुन
कर्मबन्धम्कर्म के बंधन को
प्रहास्यसितुम नष्ट कर दोगे

Word by word

WordMeaning
eṣāthis
teunto you
abhihitādescribed
sāṃkhyein analytical knowledge
buddhiḥintelligence
yogein Yoga (selfless action)
tunow
imāmthis
śṛṇuhear
buddhyāby intelligence
yuktaḥendowed
yayāby which
pārthaO son of Pritha
karmabandhambondage of action
prahāsyasiyou will cast off