श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.33

मूल श्लोक :

अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अब अगर तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करेगा तो अपने धर्म और कीर्तिका त्याग करके पापको प्राप्त होगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यदि तुम इस युद्ध से विरत हो जाओगे तो न केवल स्वधर्म और कीर्ति को ही खो दोगे वरन् निश्चय रूप से पाप के भागीदार भी बनोगे। अधर्मियों का प्रतिकार न करना निरपराध व्यक्ति की हत्या करने के समान ही घोर पाप है।धर्म शब्द का विवेचन पहले किया जा चुका है। प्रत्येक प्राणी पूर्वार्जित वासनाओं के साथ किसी देह विशेष में विशेष प्रयोजनार्थ इस जगत् में जन्म लेता है। वह विशेष प्रयोजन इन वासनाओं का क्षय करके स्वस्वरूप को पहचानना है। प्रत्येक व्यक्ति जिन वासनाओं के साथ जन्म लेता है वहीं उसका स्वधर्म स्वभाव कहलाता है। अर्जुन का स्वधर्म क्षत्रिय का है जिसका विशेष गुण आदर और यशपूर्ण शौर्य है।वासना क्षय के लिए जीवन में प्राप्त इन अवसरों को खो देना विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करना है। यदि इनका क्षय न हुआ तो मनुष्य के मन पर वासनाओं का दबाव बढ़ता जाता है क्योंकि पूर्वार्जित वासनाओं के साथ नएनए संस्कार भी एकत्र होते जाते हैं। प्राप्त क्षण में भले ही अर्जुन युद्ध भूमि से भाग जाये परन्तु बाद में इस अवसर को खो देने का पश्चात्ताप ही उसको होगा क्योंकि इस प्रकार का पलायन उसके उस क्षत्रिय स्वभाव के सर्वदा विपरीत है जिसे युद्ध में ही चिर शान्ति प्राप्त हो सकती है। जिस बालक में कला के प्रति स्वभाविक रुचि और प्रवृत्ति है वह कभी सफल व्यापारी नहीं बन सकता। पुत्र प्रेम के कारण यदि मातापिता अपनी इच्छाओं काे अपने पुत्र पर थोप देते हैं तो यह देखा जाता है कि ऐसे बालक का व्यक्तित्व बिखरा हुआ रहता है।इस तरह के उदाहरण विश्व में प्रत्येक क्षेत्र में पाये जाते हैं और विशेषकर आध्यात्मिक क्षेत्र में। बहुत से व्यक्ति थोड़े से दुख और कष्ट के आघात से क्षणिक वैराग्य के कारण ईश्वर की खोज में गृह त्यागकर जंगलों में चले जाते हैं किन्तु वहाँ जीवन भर वे अशान्ति और दुख ही पाते हैं। मन में विषयोपयोग की वासनाएँ होती है जो पारिवारिक जीवन में पूर्ण की जा सकती हैं। परन्तु गृह त्यागकर हिमालय की कन्दराओं में बैठने से न तो वे इन वासनाओं को ही पूर्ण कर पाते हैं और न ईश्वर का ध्यान उनके लिए सम्भव होता है। स्वभाविक है कि उनके मन में विक्षेप बढ़ते जाते हैं जिन्हें पाप कहते हैं।हिन्दू धर्म के अनुसार अपने आत्मस्वरूप को भूलकर मनुष्य जो गलतियाँ करता है उन्हें पाप कहते हैं। विषयोपभोग के लिए मनुष्य के द्वारा सुख प्राप्ति के प्रयत्नों के कारण मन में विक्षेप उत्पन्न होना स्वाभाविक है और यही पाप है क्योंकि इसमें आनन्दस्वरूप आत्मा का विस्मरण है।इतना ही नहीं कि तुम कर्तव्य और कीर्ति को खो दोगे बल्कि

English Translation By Swami Sivananda

But if thou wilt not fight this righteous war, then having abandoned thine own duty and fame, thou shalt incur sin.

Transliteration

atha cait tvam imaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpam avāpsyasi

अनुवाद

किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होओगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को युद्ध न करने के परिणामों के बारे में चेतावनी दे रहे हैं। एक क्षत्रिय के रूप में धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना अर्जुन का परम कर्तव्य है। यदि वह इस कर्तव्य से पीछे हटता है, तो वह न केवल अपना सम्मान और यश खो देगा, बल्कि उसे पाप भी लगेगा।

Translation

But if you will not fight this righteous war, then, having abandoned your own duty and glory, you will incur sin.

Meaning

In this verse, Lord Krishna warns Arjuna about the consequences of refusing to fight. As a warrior, it is Arjuna’s supreme duty to fight for righteousness. If he shrinks from this duty, he will not only lose his honor and fame but will also incur sin.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अथकिन्तु
चेत्यदि
त्वम्तुम
इमम्इस
धर्म्यम्धर्मयुक्त
संग्रामम्युद्ध को
ननहीं
करिष्यसिकरोगे
ततःतो
स्वधर्मम्अपने धर्म को
कीर्तिम्कीर्ति को
चऔर
हित्वाखोकर
पापम्पाप को
अवाप्स्यसिप्राप्त होओगे

Word by word

WordMeaning
athabut
cetif
tvamyou
imamthis
dharmyamrighteous
saṃgrāmamwar
nanot
kariṣyasiwill do (fight)
tataḥthen
svadharmamown duty
kīrtimglory
caand
hitvāhaving abandoned
pāpamsin
avāpsyasiwill incur