श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.3

मूल श्लोक :

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण जो अब तक मौन खड़े थे अब प्रभावशाली शब्दों द्वारा शोकाकुल अर्जुन की कटु र्भत्सना करते हैं। उनके प्रत्येक शब्द का आघात कृपाण के समान तीक्ष्ण है जो किसी भी व्यक्ति को परास्त करने के लिये पर्याप्त है। क्लैब्य का अर्थ है नपुंसकता। यहाँ इस शब्द से तात्पर्य मन की उस स्थिति से है जिसमें व्यक्ति न तो एक पुरुष के समान परिस्थिति का सामना करने का साहस अपने में कर पाता है और न ही एक कोमल भावों वाली लज्जालु स्त्री के समान निराश होकर बैठा रह सकता है। आजकल की भाषा में किसी व्यक्ति के इस प्रकार के व्यवहार में उसके मित्र आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं कि यह आदमी स्त्री है या पुरुष  अर्जुन की भी स्थित राजदरबार के उन नपुंसक व्यक्तियों के समान हो रही थी जो देखने में पुरुष जैसे होकर स्त्री वेष धारण करते थे। पुरुष के समान बोलते लेकिन मन में स्त्री जैसे भावुक होते शरीर से समर्थ किन्तु मन से दुर्बल रहते थे।अब तक श्रीकृष्ण मौन थे उनका गम्भीर मौन अर्थपूर्ण था। अर्जुन मोहावस्था में युद्ध न करने का निर्णय लेकर अपने पक्ष में अनेक तर्क भी प्रस्तुत कर रहा था। श्रीकृष्ण जानते थे कि पहले ऐसी स्थिति में अर्जुन का विरोध करना व्यर्थ था। परन्तु अब उसके नेत्रों में अश्रु देखकर वे समझ गये कि उसका संभ्रम अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है।भक्ति परम्परा में यह सही ही विश्वास किया जाता है कि जब तक हम अपने को बुद्धिमान समझकर तर्क करते रहते हैं तब तक भगवान् पूर्णतया मौन धारण किये हुए अनसुना करते रहते हैं किन्तु ज्ञान के अहंकार को त्यागकर और भक्ति भाव से विह्वल होकर अश्रुपूरित नेत्रों से उनकी शरण में चले जाने पर करुणासागर भगवान् अपने भक्त को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर मार्गदर्शन करने के लिये उसके पास बिना बुलाये तुरन्त पहुँचते हैं। इस भावनापूर्ण स्थिति में जीव को ईश्वर के मार्गदर्शन और सहायता की आवश्यकता होती है।ईश्वर की कृपा को प्राप्त कर भक्त का अन्तकरण निर्मल होकर आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है जो स्वप्रकाशस्वरूप चैतन्य के साक्षात् अनुभव के लिये अत्यन्त आवश्यक है। इस स्वीकृत तथ्य के अनुसार तथा जो भक्तों का भी अनुभव है गीता में हम देखते हैं कि जैसे ही भगवान ने बोलना प्रारम्भ किया वैसे ही विद्युत के समान उनके प्रज्ज्वलित शब्द अर्जुन के मन पर पड़े जिससे वह अपनी गलत धारणाओं के कारण अत्यन्त लज्जित हुआ।सहानुभूति के कोमल शब्द अर्जुन के निराश मन को उत्साहित नहीं कर सकते थे। अत व्यंग्य के अम्ल में डुबोये हुये तीक्ष्ण बाण के समान वचनों से अर्जुन को उत्तेजित करते हुये अंत में भगवान् कहते हैं उठो और कर्म करो।

English Translation By Swami Sivananda

Yield not to impotence, O Arjuna, son of Pritha. It does not befit thee. Cast off this mean weakness of the heart! Stand up, O scorcher of the foes!

Transliteration

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate
kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa

अनुवाद

हे पृथापुत्र! इस कायरता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हारे योग्य नहीं है। हे परन्तप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर उठ खड़े हो।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण युद्ध के मैदान में अर्जुन की अचानक उत्पन्न हुई कायरता की कड़ी निंदा करते हैं। वे अर्जुन को याद दिलाते हैं कि एक महान योद्धा होने के नाते यह आचरण उनके बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है। कृष्ण उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे अपने हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग दें और अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए उठ खड़े हों।

Translation

O son of Pritha, do not yield to this unmanliness. It does not befit you. O chastiser of enemies, give up this petty weakness of heart and arise.

Meaning

In this verse, Lord Krishna strongly rebukes Arjuna for his sudden despondency on the battlefield. He reminds Arjuna of his noble lineage and his reputation as a formidable warrior, stating that such cowardice is entirely uncharacteristic of him. Krishna urges him to cast off this petty emotional weakness and stand up to perform his duty.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
क्लैब्यम्कायरता को
मामत
स्मकभी
गमःप्राप्त हो
पार्थहे पृथापुत्र
नहीं
एतत्यह
त्वयितुम्हारे लिए
उपपद्यतेउचित है
क्षुद्रम्तुच्छ
हृदयहृदय की
दौर्बल्यम्दुर्बलता को
त्यक्त्वात्याग कर
उत्तिष्ठउठ खड़े हो
परन्तपहे शत्रुओं को तपाने वाले

Word by word

WordMeaning
klaibyamunmanliness
do not
smaever
gamaḥyield to
pārthaO son of Pritha
nanot
etatthis
tvayiin you
upapadyateis befitting
kṣudrampetty
hṛdayaof the heart
daurbalyamweakness
tyaktvāhaving given up
uttiṣṭhaarise
parantapaO chastiser of enemies