Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.28
मूल श्लोक :
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवनाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे भारत सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे केवल बीचमें प्रकट दीखते हैं अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक से लेकर आगे के कुछ श्लोकों में संसार के सामान्य मनुष्य के दृष्टिकोण से समस्या को अर्जुन के समक्ष बड़ी सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है। इन दस श्लोकों में श्रीकृष्ण समस्या का स्पष्टीकरण सामान्य व्यक्ति की दृष्टि एवं बुद्धि के अनुसार प्रस्तुत करते हैं।इस भौतिक जगत् में कार्यकरण का नियम अबाधरूप से कार्य करते हुए अनुभव में आता है। कार्य की उत्पत्ति कारण से होती है। सामान्यत कार्य व्यक्त रूप में दिखाई देता है और कारण अव्यक्त रहता है। अत सृष्टिका अर्थ है वस्तुओं का अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आ जाना। यही क्रम निरन्तर नियमपूर्वक चलता रहता है।इस प्रकार आज का व्यक्त इसके पूवर् कल अव्यक्त था वर्तमान में वह व्यक्त रूप में उपलब्ध है परन्तु भविष्य में फिर अव्यक्त अवस्था में विलीन हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान स्थिति अज्ञात से आयी और पुन अज्ञात में लीन हो जायेगी। ऐसा समझने पर दुख का कोई कारण नहीं रह जाता क्योंकि एक चक्र के आरे निरन्तर घूमते हुए नीचे भी आते हैं तो केवल बाद में ऊपर उठने के लिए ही।उदाहरणार्थ स्वप्न के पत्नी और शिशु पहले अव्यक्त थे और जागने पर फिर लुप्त हो जाते हैं तो एक ब्रह्मचारी को उस पत्नी और शिशु के लिए शोक करने का क्या कारण है जिसके साथ उसका विवाह कभी हुआ ही नहीं था और जिस शिशु का कभी जन्म ही नहीं हुआ था यदि जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा इस जगत् की उत्पत्ति और लय का चक्र निरन्तर एक पारमार्थिक नित्य अविकारी सत्य के रूप में ही चल रहा है तो क्या कारण है कि उस सत्य को बारम्बार बताने पर भी हम समझ नहीं पाते श्रीशंकराचार्य के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण यह विचार करते हैं कि इस सत्य को न समझने के लिए अर्जुन को दोष देना उचित नहीं है।श्री शंकराचार्य कहते हैं इस आत्मा का साक्षात् अनुभव करके उसे यथार्थ में जानना कठिन है। तुम्हें ही मैं दोष क्यों दूँ जबकि इसका कारण अज्ञान सबके लिए समान है कोई पूछ सकता है कि आत्मानुभव में इतनी कठिनाई क्या है भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Beings are unmanifested in their beginning, manifested in their middle state, O Arjuna, and unmanifested again in their end. What is there to grieve about?
Transliteration
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata
avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanāअनुवाद
हे भरतवंशी! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, मध्य में (जीवन काल में) प्रकट हैं और मृत्यु के बाद फिर से अप्रकट हो जाने वाले ही हैं। अतः इसमें शोक करने की क्या बात है?
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को भौतिक शरीर की क्षणभंगुरता समझाते हैं। जन्म से पूर्व सभी प्राणी अप्रकट अवस्था में होते हैं और मृत्यु के पश्चात पुनः उसी अप्रकट अवस्था में विलीन हो जाते हैं। केवल जीवन का मध्य भाग ही दृष्टिगोचर होता है, इसलिए इस अपरिहार्य चक्र के विषय में शोक करना व्यर्थ है।
Translation
O descendant of Bharata, all created beings are unmanifest in their beginning, manifest in their middle state, and unmanifest again when annihilated. What need is there for lamentation?
Meaning
Krishna explains the temporary nature of physical existence to Arjuna. Before birth, beings exist in an unmanifest state, and after death, they return to that same unmanifest state. Since only the brief middle phase of life is visible, there is no logical reason to grieve over the inevitable cycle of birth and death.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अव्यक्त | अप्रकट |
| आदीनि | आदि में (जन्म से पहले) |
| भूतानि | सम्पूर्ण प्राणी |
| व्यक्त | प्रकट |
| मध्यानि | मध्य में |
| भारत | हे भरतवंशी |
| अव्यक्त | अप्रकट |
| निधनानि | मृत्यु के बाद |
| एव | ही |
| तत्र | उस स्थिति में |
| का | क्या |
| परिदेवना | शोक या विलाप |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| avyakta | unmanifest |
| ādīni | in the beginning |
| bhūtāni | all beings |
| vyakta | manifest |
| madhyāni | in the middle |
| bhārata | O descendant of Bharata |
| avyakta | unmanifest |
| nidhanāni | at death |
| eva | indeed |
| tatra | in that situation |
| kā | what |
| paridevanā | lamentation |