श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.23

मूल श्लोक :

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते अग्नि इसको जला नहीं सकती जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अदृष्ट वस्तु को सदैव दृष्ट वस्तुओं के द्वारा ही समझाया जा सकता है। परिभाषा मात्र से वह वस्तु अज्ञात ही रहेगी। यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अविकारी नित्य आत्मतत्त्व का वर्णन अर्जुन को और हमको परिचित विकारी नित्य परिवर्तनशील जगत् के द्वारा करते हैं। यह तो सर्वविदित है कि वस्तुओं का नाश शस्त्र आदि अथवा प्रकृति के नाश के साधनों अग्नि जल और वायु के द्वारा संभव है। इनमें से किसी भी साधन से आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता।शस्त्र इसे काट नहीं सकते  यह सर्वविदित है कि एक कुल्हाड़ी से वृक्ष आदि को काटा जा सकता है परन्तु उसके द्वारा जलअग्नि वायु या आकाश को किसी प्रकार की चोट नहीं पहुँचायी जा सकती। सिद्धांत यह है कि स्थूल साधन अपने से सूक्ष्म वस्तु का नाश नहीं कर सकता । इसलिये स्वाभाविक ही है कि आत्मा जो कि सूक्ष्मतम तत्त्व आकाश से भी सूक्ष्म है का नाश शस्त्रों से नहीं हो सकता।अग्नि जला नहीं सकती  अग्नि अपने से भिन्न वस्तुओं को जला सकती है परन्तु वह स्वयं को ही कभी नहीं जला सकती। ज्वलन अग्नि का धर्म है और अपने धर्म का अपने सत्य स्वरूप का वह नाश नहीं कर सकती। विचारणीय बात यह है कि आकाश में रहती हुई अग्नि आकाश में स्थित वस्तुओं को तो जला पाती है परन्तु आकाश को कभी नहीं। फिर आकाश से सूक्ष्मतर आत्मा को जलाने में वह अपने आप को कितना निस्तेज पायेगी जल गीला नहीं कर सकता  पूर्व वर्णित सिद्धांत के अनुसार ही हम यह भी समझ सकते हैं कि जल आत्मा को आर्द्र या गीला नहीं कर सकता और न उसे डुबो सकता है। ये दोनों ही किसी द्रव्य युक्त साकार वस्तु के लिये संभव हैं और न कि सर्वव्यापी निराकार आत्मतत्व के लिये।वायु सुखा नहीं सकती  जो वस्तु गीली होती है उसी का शोषण करके उसे शुष्क बनाया जा सकता है। आजकल सब्जियाँ और खाद्य पदार्थों के जल सुखाकर सुरक्षित रखने के अनेक साधन उपलब्ध हैं। परन्तु आत्मतत्त्व में जल का कोई अंश ही नहीं है क्योंकि वह अद्वैत स्वरूप है  तब वायु के द्वारा शोषित होकर उसके नाश की कोई संभावना नहीं रह जाती।इन शब्दों के सरल अर्थ के अलावा इस श्लोक का गम्भीर अर्थ भी है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोक में और अधिक स्पष्ट करते हैं कि आत्मतत्त्व क्यों और कैसे शाश्वत है।यह आत्मा सनातन किस प्रकार है  इसे सनातन स्वरूप से क्यों और कैसे पहचाना जा सकता है।

English Translation By Swami Sivananda

Weapons cut It not, fire burns It not, water wets It not, wind dries It not.

Transliteration

nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ
na cainaṃ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ

अनुवाद

इस (आत्मा) को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकती, इसको जल भिगो नहीं सकता, और वायु इसे सुखा नहीं सकती।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमर और अविनाशी प्रकृति के बारे में बताते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि भौतिक तत्त्व जैसे शस्त्र, अग्नि, जल और वायु इस शाश्वत आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। यह ज्ञान अर्जुन को अपने स्वजनों की मृत्यु के शोक से मुक्त करने के लिए दिया गया है, क्योंकि उनका वास्तविक स्वरूप कभी नष्ट नहीं हो सकता।

Translation

Weapons cannot cut this (soul), fire cannot burn this, water cannot wet this, and wind cannot dry this.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the immortal and indestructible nature of the soul to Arjuna. He emphasizes that the physical elements—weapons, fire, water, and air—have no effect on the eternal soul. This knowledge is meant to free Arjuna from the grief of potentially killing his relatives, as their true essence can never be destroyed.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ननहीं
एनम्इस (आत्मा) को
छिन्दन्तिकाट सकते हैं
शस्त्राणिशस्त्र
ननहीं
एनम्इसको
दहतिजलाती है
पावकःआग
ननहीं
चऔर
एनम्इसको
क्लेदयन्तिभिगोते हैं
आपःजल
ननहीं
शोषयतिसुखाती है
मारुतःवायु

Word by word

WordMeaning
nanot
enamthis (soul)
chindantican cut
śastrāṇiweapons
nanot
enamthis
dahatiburns
pāvakaḥfire
nanot
caand
enamthis
kledayantimoisten
āpaḥwater
nanot
śoṣayatidries
mārutaḥwind