Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.2
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुनHindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले (टिप्पणी प0 38.1) हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अपने आप को आर्य कहलाने वाले एक राजा को युद्धभूमि में इस प्रकार हतबुद्धि देखकर भगवान् को आश्चर्य हो रहा था। एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है और उनको अपने अनुकूल बना लेता है। समुचित शैली में जीवन यापन करके अत्यन्त प्रतिकूल और विषम परिस्थितियों को भी आनन्ददायक सफलता में परिवर्तित किया जा सकता है। यह सब मनुष्य की बुद्धिमत्ता पर निर्भर है कि वह अपने आप को जीवन के उत्थानपतन में सही दिशा में किस प्रकार ले जाता है। यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं। आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं ।अर्जुन की इस शोकाकुल अवस्था को देखकर श्रीकृष्ण को आश्चर्य इसलिये हो रहा था कि वे दीर्घ काल से अच्छी प्रकार जानते थे और इस प्रकार का शोकमोह अर्जुन के स्वभाव के सर्वथा विपरीत था। इसीलिये वे यहाँ कहते हैं तुमको इस विषमस्थल में৷৷.आदि।हिन्दुओं का यह विश्वास है कि क्षत्रिय कुल में जन्मे हुये व्यक्ति का कर्तव्य है धर्म के लिये युद्ध करना और इस प्रकार यदि उसे रणभूमि में प्राण त्यागना पड़े तो उस वीर को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said Whence is this perilous strait come upon thee, this dejection which is unworthy of you, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon you, O Arjuna?
Transliteration
śrī bhagavān uvāca
kutas tvā kaśmalam idaṃ viṣame samupasthitam
anāryajuṣṭam asvargyam akīrtikaram arjunaअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — हे अर्जुन! इस विषम परिस्थिति में तुम्हारे अंदर यह अज्ञान (मोह) कहाँ से आ गया? यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग देने वाला है और न ही कीर्ति करने वाला है।
भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण युद्धभूमि में अर्जुन के अचानक उत्पन्न हुए मोह और कायरता पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। वे अर्जुन को फटकारते हुए कहते हैं कि ऐसा आचरण किसी श्रेष्ठ पुरुष (आर्य) को शोभा नहीं देता। श्रीकृष्ण उसे याद दिलाते हैं कि अपने कर्तव्य से विमुख होने पर न तो उसे इस लोक में यश मिलेगा और न ही मृत्यु के पश्चात उच्च लोकों की प्राप्ति होगी।
Translation
The Supreme Lord said: From where has this delusion come upon you in this hour of peril? It is not practiced by honorable men, it does not lead to heaven, and it causes infamy, O Arjuna.
Meaning
Lord Krishna expresses surprise at Arjuna’s sudden despair and cowardice on the battlefield. He rebukes Arjuna, stating that such behavior is uncharacteristic of a noble warrior. Krishna reminds him that abandoning his duty will neither bring him glory in this world nor elevate him to higher realms in the afterlife.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रीभगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | बोले |
| कुतः | कहाँ से |
| त्वा | तुम्हें |
| कश्मलम् | मोह (मलिनता) |
| इदम् | यह |
| विषमे | इस संकट में |
| समुपस्थितम् | प्राप्त हुआ है |
| अनार्यजुष्टम् | श्रेष्ठ पुरुषों के लिए अनुचित |
| अस्वर्ग्यम् | स्वर्ग न देने वाला |
| अकीर्तिकरम् | अपयश कराने वाला |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrībhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| kutaḥ | from where |
| tvā | unto you |
| kaśmalam | delusion (impurity) |
| idam | this |
| viṣame | in this crisis |
| samupasthitam | arrived |
| anāryajuṣṭam | unpracticed by honorable men |
| asvargyam | not leading to heaven |
| akīrtikaram | causing infamy |
| arjuna | O Arjuna |