श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.18

मूल श्लोक :

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अविनाशी अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरके ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आत्मा द्वारा धारण किये हुये भौतिक शरीर नाशवान् हैं जबकि आत्मा नित्य अविनाशी और अप्रमेय अर्थात् बुद्धि के द्वारा जानी नहीं जा सकती। यहाँ आत्मा नित्य और अविनाशी है ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि आत्मा का न पूर्णत नाश होता है और न अंशत।नित्य आत्मतत्त्व को अज्ञेय कहा है जिसका अर्थ यह नहीं कि वह अज्ञात है। इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार हम इन्द्रियों के द्वारा विषयों को जानते हैं उस प्रकार इस आत्मा को नहीं जाना जा सकता। इसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ मन और बुद्धि आदि हमारे ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं  वे स्वत जड़ हैं और चैतन्य आत्मा की उपस्थिति में ही वे अन्य वस्तुओं को प्रकाशित कर सकते हैं। अब जिस चैतन्य के कारण इन्द्रियाँ आदि उपकरण विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं तब उसी चैतन्य को वे प्रत्यक्ष विषय के रूप में किस प्रकार जान सकते हैं  यह सर्वथा असम्भव है और इसी दृष्टि से यहाँ आत्मा को अज्ञेय कहा गया है। आत्मा स्वत सिद्ध है।इसलिये हे भारत  तुम युद्ध करो वास्तव में इस वाक्य के द्वारा सबको युद्ध करने का आदेश नहीं दिया गया है। जिस धर्म की आधारशिला क्षमा और उदार सहिष्णुता है उसी धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में इस प्रकार का युद्ध का नारा संभव नहीं हो सकता। कोई टीकाकार यदि ऐसा अर्थ करता है तो वह अनुचित है और वह गीता को महाभारत के सन्दर्भ में नहीं पढ़ रहा है। हे भारत  तुम युद्ध करो ये शब्द धर्म का आह्वान है प्रत्येक व्यक्ति के लिये जिससे वह पराजय की प्रवृत्ति को छोड़कर जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति का निष्ठापूर्वक और साहस के साथ सामना करे। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार  यह गीता में श्रीकृष्ण का मुख्य संदेश है।अब आगे भगवान् उपनिषदों के दो मन्त्र सिद्ध करने के लिये उद्धृत करते हैं कि शास्त्र का मुख्य प्रयोजन संसार के मूल कारण मोह  अविद्या की निवृत्ति करना है। भगवान् कहते हैं  यह तुम्हारी मिथ्या धारणा है कि भीष्म और द्रोण मेरे द्वारा मारे जायेंगे और मैं उनका हत्यारा बनूँगा৷৷. कैसे

English Translation By Swami Sivananda

These bodies of the embodied Self, Which is eternal, indestructible and immeasurable, are said to have an end. Therefore fight, O Arjuna.

Transliteration

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ
anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata

अनुवाद

इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय जीवात्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए, हे भरतवंशी, युद्ध करो।

भावार्थ

भगवान कृष्ण भौतिक शरीर और आत्मा के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करते हैं। जहाँ एक ओर यह भौतिक शरीर अस्थायी और नाशवान है, वहीं इसके भीतर निवास करने वाली आत्मा नित्य, अविनाशी और अकल्पनीय है। चूँकि वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को कभी मारा नहीं जा सकता, इसलिए कृष्ण अर्जुन को अपना शोक त्याग कर एक क्षत्रिय के रूप में युद्ध करने का निर्देश देते हैं।

Translation

These bodies of the eternal, indestructible, and immeasurable embodied soul are said to have an end. Therefore, fight, O descendant of Bharata.

Meaning

Lord Krishna explains the fundamental difference between the physical body and the soul. While the material body is temporary and destined to perish, the soul within is eternal, indestructible, and beyond human comprehension. Because the true self cannot be killed, Krishna urges Arjuna to abandon his grief and perform his duty as a warrior by fighting the righteous war.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अन्तवन्तःनाशवान
इमेये
देहाःशरीर
नित्यस्यनित्य के
उक्ताःकहे गए हैं
शरीरिणःजीवात्मा के
अनाशिनःअविनाशी के
अप्रमेयस्यअप्रमेय के
तस्मात्इसलिए
युध्यस्वयुद्ध करो
भारतहे भरतवंशी

Word by word

WordMeaning
antavantaḥperishable
imethese
dehāḥbodies
nityasyaof the eternal
uktāḥare said
śarīriṇaḥof the embodied soul
anāśinaḥof the indestructible
aprameyasyaof the immeasurable
tasmāttherefore
yudhyasvafight
bhārataO descendant of Bharata