Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.16
मूल श्लोक :
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 55) असत्का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वेदान्त शास्त्र में सत् असत् का विवेक अत्यन्त वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है। हमारे दर्शनशास्त्र में इन दोनों की ही परिभाषायें दी हुई हैं। असत् वस्तु वह है जिसकी भूतकाल में सत्ता नहीं थी और भविष्य में भी वह नहीं होगी परन्तु वर्तमान में उसका अस्तित्व प्रतीतसा होता है। माण्डूक्य कारिका की भाषा में जिसका अस्तित्व प्रारम्भ और अन्त में नहीं है वह वर्तमान में भी असत् ही है हमें दिखाई देने वाली वस्तुयें मिथ्या होने पर भी उन्हें सत् माना जाता है।स्वाभाविक ही सत्य वस्तु वह है जो भूतवर्तमान भविष्य इन तीनों कालों में भी नित्य अविकारी रूप में रहती है। सामान्य व्यवहार में यदि कोई व्यक्ति किसी स्तम्भ को भूत समझ लेता है तो स्तम्भ की दृष्टि से भूत को असत् कहा जायेगा क्योंकि भूत अनित्य है और स्तम्भ का ज्ञान होने पर वहाँ रहता नहीं। इसी प्रकार स्वप्न से जागने पर स्वप्न के बच्चों के लिये हमें कोई चिन्ता नहीं होती क्योंकि जागने पर स्वप्न के मिथ्यात्व का हमें बोध होता है। प्रतीत होने पर भी स्वप्न मिथ्या है। अत तीनों काल में अबाधित वस्तु ही सत्य कहलाती है।शरीर मन और बुद्धि इन जड़ उपाधियों के साथ हमारा जीवन परिच्छिन्न है क्योंकि इनके द्वारा प्राप्त बाह्य विषय भावना और विचारों के अनुभव क्षणिक होते हैं। इन तीनों में ही नित्य परिवर्तन हो रहा है। एक अवस्था का नाश दूसरी अवस्था की उत्पत्ति है। परिभाषा के अनुसार ये सब असत् हैं।क्या इनके पीछे कोई सत्य वस्तु है इसमें कोई संदेह नहीं कि वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों के लिये किसी एक अविकारी अधिष्ठान आश्रय की आवश्यकता है। शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले असंख्य अनुभवों को एक सूत्र में धारण कर एक पूर्ण जीवन का अनुभव कराने के लिये निश्चय ही एक नित्य अपरिर्तनशील सत् वस्तु का अधिष्ठान आवश्यक है।मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है। सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा है। असंख्य अनुभव जो प्रकाशित हुये उनमें से कोई अनुभव आत्मा नहीं है। जीवन जो कि अनुभवों की एक धारा है योग है इस चैतन्य के कारण ही सम्भव है। बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण मैंने सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है।तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत् आत्मा और अनात्मा के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है।फिर वह नित्य सद्वस्तु क्या है सुनो
English Translation By Swami Sivananda
The unreal hath no being; there is non-being of the real; the truth about both has been seen by the knowers of the Truth (or the seers of the Essence).
Transliteration
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ
ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥअनुवाद
असत् (अविद्यमान) का कोई अस्तित्व नहीं है और सत् (विद्यमान) का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों का ही यह निष्कर्ष देखा है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को सत् (आत्मा) और असत् (भौतिक शरीर) के बीच का अंतर समझाते हैं। जो असत् है, जैसे कि यह भौतिक शरीर, उसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है और वह नष्ट होने वाला है। वहीं जो सत् है, अर्थात् आत्मा, उसका कभी विनाश नहीं होता। तत्त्वज्ञानी महापुरुषों ने इस सत्य को भली-भांति जानकर यह निष्कर्ष निकाला है।
Translation
The non-existent has no being, and the existent has no non-being. The conclusion about both of these has indeed been seen by the seers of truth.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna the fundamental difference between the real (the soul) and the unreal (the physical body). The unreal, such as the material body, has no permanent existence and is bound to perish. Conversely, the real, which is the eternal soul, can never cease to exist. The seers of truth have reached this definitive conclusion after studying the nature of both.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| असतः | असत् का |
| विद्यते | होता है |
| भावः | अस्तित्व |
| न | नहीं |
| अभावः | अभाव |
| विद्यते | होता है |
| सतः | सत् का |
| उभयोः | दोनों का |
| अपि | भी |
| दृष्टः | देखा गया है |
| अन्तः | निष्कर्ष |
| तु | निश्चय ही |
| अनयोः | इन |
| तत्त्वदर्शिभिः | तत्त्वदर्शियों द्वारा |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| asataḥ | of the non-existent |
| vidyate | there is |
| bhāvaḥ | existence |
| na | not |
| abhāvaḥ | non-existence |
| vidyate | there is |
| sataḥ | of the existent |
| ubhayoḥ | of both |
| api | also |
| dṛṣṭaḥ | observed |
| antaḥ | conclusion |
| tu | indeed |
| anayoḥ | of these |
| tattvadarśibhiḥ | by the seers of truth |