Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.15
मूल श्लोक :
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सुखदुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुँचाते वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सुख और दुख को शान्त भाव से सहन करने का नाम तितिक्षा है जो उपनिषदों के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिये एक आवश्यक गुण है। इसी को ध्यान में रखकर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की तितिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।यहाँ मोक्ष का तात्पर्य अमृतत्व शब्द से किया है। इस शब्द से स्थूल शरीर का मोक्ष नहीं समझना चाहिये। यहाँ इस शब्द का उपयोग उसके व्यापक अर्थ में किया गया है। शरीर मन और बुद्धि तथा इनके द्वारा प्राप्त सभी अनुभव र्मत्य और अनित्य ही हैं। इन उपाधियों के साथ हमारा तादात्म्य होने से इनके जन्ममरणादि धर्मों से हम प्रभावित होकर दुखी होते हैं। अमृतत्व का अर्थ है जो पुरुष अपने नित्य आत्मस्वरूप को पहचान लेता है वह इन सब अनुभवों को प्राप्त कर उनके मध्य रहता हुआ भी शोकमोह को प्राप्त नहीं होता। उसे अपने अमृतस्वरूप का विस्मरण नहीं होता।गीता के द्वारा महान् कवि व्यास जी भगवान् श्रीकृष्ण के माध्यम से हमें हमारे जीवन का लक्ष्य बताते हैं पूर्णत्व की प्राप्ति। अल्पकाल के लिये प्राप्त इस जीवन में हमको इस लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिये। चिन्तित हुये बिना प्रसन्नतापूर्वक जीवन में आने वाले सुखदुखादि कष्टों को सहन करने की सर्वोच्च साधना करने का इन परिस्थितियों में हमें अवसर मिलता है।तितिक्षा का अर्थ निराश उदास भाव से जो हो रहा है उसको सहन करना ऐसा नहीं है। यहाँ विशेष रूप से कहा है कि शीतोष्णादि द्वन्द्वों में जिसका मन समभाव में स्थित रहता है वह धीर पुरुष मोक्ष का अधिकारी होता है। यहाँ प्रयोजन निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में उसे हर्षातिरेक नहीं होता और न दुख में अत्यन्त विषाद।जब तक देह के साथ हमारी अत्यन्त आसक्ति रहती है तब तक उसमें होने वाली पीड़ाओं से हम विलग नहीं हो सकते और हम व्यथित हो जाते हैं। हृदय में प्रेम अथवा घृणा के भाव के प्रादुर्भाव से यदि शारीरिक कष्ट सहने की आवश्यकता पड़ती है तो वह क्षमता हममें आ जाती है। पुत्र के प्रति प्रेम के कारण उसको शिक्षा आदि देने के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम बड़ी प्रसन्नता से अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का त्याग करने के लिए तैयार हो जाते हैं। वह असुविधा हमें कष्ट नहीं पहुँचाती। इसी प्रकार बुद्धिनिष्ठ आदर्शों की प्राप्ति के लिए शरीर और मन के आरामों को भी हम त्याग देते हैं। विश्व के अनेक देशभक्त क्रान्तिकारियों ने अपने देश की स्वतन्त्र्ाता के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट सहन करके अपने प्राणों की आहुति दी है।निम्नलिखित कारणों से भी तुम्हारे लिए उचित है कि शोक और मोह को छोड़ कर तुम शान्तिपूर्वक शीतादि को सहन करो। क्योंकि
English Translation By Swami Sivananda
That firm man whom, surely, these afflict not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality.
Transliteration
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpateअनुवाद
हे पुरुषों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! जो पुरुष इन (इन्द्रिय विषयों) से विचलित नहीं होता, जो सुख और दुःख में समान रहता है और जो धीर है, वह निश्चित रूप से मोक्ष (अमरता) के योग्य होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण भौतिक संसार के द्वंद्वों को सहन करने का परिणाम बताते हैं। जो व्यक्ति सुख और दुःख के क्षणिक अनुभवों से विचलित नहीं होता, वह आध्यात्मिक रूप से परिपक्व हो जाता है। ऐसा स्थिर और धीर व्यक्ति ही मोक्ष या अमरता प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।
Translation
O best among men, the person who is not disturbed by these, who remains steady in happiness and distress, and who is wise, is certainly eligible for immortality.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the result of tolerating the dualities of the material world. A person who remains undisturbed by the fleeting experiences of happiness and distress becomes spiritually mature. Such a steady and wise individual attains the qualification for liberation or immortality.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यम् | जिसको |
| हि | निश्चय ही |
| न | नहीं |
| व्यथयन्ति | विचलित करते हैं |
| एते | ये |
| पुरुषम् | पुरुष को |
| पुरुषर्षभ | हे पुरुषों में श्रेष्ठ |
| समदुःखसुखम् | सुख और दुःख में समान रहने वाले |
| धीरम् | धीर व्यक्ति को |
| सः | वह |
| अमृतत्वाय | अमरता के लिए |
| कल्पते | योग्य होता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yam | whom |
| hi | certainly |
| na | not |
| vyathayanti | disturb |
| ete | these |
| puruṣam | the person |
| puruṣarṣabha | O best among men |
| samaduḥkhasukham | steady in happiness and distress |
| dhīram | the wise one |
| saḥ | he |
| amṛtatvāya | for immortality |
| kalpate | becomes eligible |