श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.14

मूल श्लोक :

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं वे तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं। वे आनेजानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन उनको तुम सहन करो।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

विषय ग्रहण की वेदान्त की प्रक्रिया के अनुसार बाह्य वस्तुओं का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा होता है। इन्द्रियाँ तो केवल उपकरण हैं जिनके द्वारा जीव विषय ग्रहण करता है उनको जानता है। जीव के बिना केवल इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान नहीं करा सकतीं।यह तो सर्वविदित है कि एक ही वस्तु दो भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का अनुभव दे सकती है। एक ही वस्तु के द्वारा जो दो भिन्न अनुभव होते हैं उसका कारण उन दो व्यक्तियों की मानसिक संरचना का अन्तर है।यह भी देखा गया है कि व्यक्ति को एक समय जो वस्तु अत्यन्त प्रिय थी वही जीवन की दूसरी अवस्था में अप्रिय हो जाती है  क्योंकि जैसेजैसे समय व्यतीत होता जाता है उसके मन में भी परिवर्तन होता जाता है। संक्षेप में यह स्पष्ट है कि जब हमारा इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों के साथ सम्पर्क होता है तभी किसी प्रकार का अनुभव भी संभव है।जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा। काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।इस नियम को समझ कर आदि और अन्त से युक्त वस्तुओं के होने या नहीं होने से बुद्धिमान पुरुष को शोक का कोई कारण नहीं रह जाता। शीत और उष्ण सफलता और असफलता सुख और दुख  कोई भी नित्य नहीं हैं। जब वस्तुस्थिति ऐसी है तो प्रत्येक परिवर्तित परिस्थिति के कारण क्षुब्ध या चिन्तित होना अज्ञान का ही लक्षण है। जीवन में आने वाले कष्टों को चिन्तित हुये बिना शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। सभी प्रकार की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विवेकी पुरुष इस तथ्य को सदा ध्यान में रखता है कि यह भी बीत जायेगा।जगत् की वस्तुयें परिच्छिन्न हैं क्योंकि उनका आदि है और अन्त है। भगवान् कहते हैं कि ये वस्तुयें स्वभाव से ही अनित्य हैं। अनित्य शब्द से तात्पर्य यह है कि एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिये ही कभी सुखदायक तो कभी दुखदायक हो सकती है।शीतउष्ण आदि को समान भाव से सहने वाले व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा सुनिये

English Translation By Swami Sivananda

The contacts of the senses with the objects, O son of Kunti, which cause heat and cold, pleasure and pain, have a beginning and an end; they are impermanent; endure them bravely, O Arjuna.

Transliteration

mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ
āgamāpāyino'nityāstāṃstitikṣasva bhārata

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और उनके विषयों के संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले हैं। ये आने-जाने वाले और अनित्य हैं, इसलिए हे भरतवंशी! तुम उन्हें सहन करो।

भावार्थ

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख जैसी शारीरिक और मानसिक अनुभूतियाँ केवल इन्द्रियों के उनके विषयों के साथ संपर्क का परिणाम हैं। चूँकि इन अनुभवों की उत्पत्ति और अंत होता है, इसलिए ये अस्थायी और निरंतर बदलने वाले हैं। अतः एक बुद्धिमान व्यक्ति को विचलित हुए बिना इन्हें सहन करना सीखना चाहिए और हर परिस्थिति में समभाव बनाए रखना चाहिए।

Translation

O son of Kunti, the contacts between the senses and their objects, which give rise to cold and heat, pleasure and pain, are transient, coming and going. Therefore, O descendant of Bharata, endure them.

Meaning

Krishna explains to Arjuna that physical and emotional sensations like heat, cold, pleasure, and pain are merely the result of the senses interacting with the material world. Because these experiences have a beginning and an end, they are temporary and constantly changing. Therefore, a wise person should learn to tolerate them without becoming disturbed, maintaining equanimity in all situations.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मात्रास्पर्शाःइन्द्रियों के विषयों से संपर्क
तुतो
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र
शीतोष्णसुखदुःखदाःसर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले
आगमापायिनःआने-जाने वाले
अनित्याःअनित्य
तान्उनको
तितिक्षस्वसहन करो
भारतहे भरतवंशी

Word by word

WordMeaning
mātrāsparśāḥcontacts of the senses
tubut
kaunteyaO son of Kunti
śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥgiving cold, heat, pleasure, and pain
āgamāpāyinaḥcoming and going
anityāḥtemporary
tānthem
titikṣasvaendure
bhārataO descendant of Bharata