श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.13

मूल श्लोक :

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

स्मृति का यह नियम है कि अनुभवकर्त्ता तथा स्मरणकर्त्ता एक ही व्यक्ति होना चाहिये तभी किसी वस्तु का स्मरण करना संभव है। मैं आपके अनुभवों का स्मरण नहीं कर सकता और न आप मेरे अनुभवों का परन्तु हम दोनों अपनेअपने अनुभवों का स्मरण कर सकते हैं।वृद्धावस्था में हम अपने बाल्यकाल और यौवन काल का स्मरण कर सकते हैं। कौमार्य अवस्था के समाप्त होने पर युवावस्था आती है और तत्पश्चात् वृद्धावस्था। अब यह तो स्पष्ट है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति के साथ कौमार्य और युवा दोनों ही अवस्थायें नहीं हैं फिर भी वह उन अवस्थाओं में प्राप्त अनुभवों को स्मरण कर सकता है। स्मृति के नियम से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति में कुछ है जो तीनों अवस्थाओं में अपरिवर्तनशील है जो बालक और युवा शरीर द्वारा अनुभवों को प्राप्त करता है तथा उनका स्मरण भी करता है।इस प्रकार देखने पर यह ज्ञात होता है कि कौमार्य अवस्था की मृत्यु युवावस्था का जन्म है और युवावस्था की मृत्यु ही वृद्धावस्था का जन्म है। और फिर भी निरन्तर होने वाले इन परिवर्तनों से हमें किसी प्रकार का शोक नहीं होता बल्कि इन अवस्थाओं से गुजरते हुये असंख्य अनुभवों को प्राप्त कर हम प्रसन्न ही होते हैं।जगत् में प्रत्येक व्यक्ति के इस निजी अनुभव का दृष्टान्त के रूप में उपयोग करके श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि बुद्धिमान पुरुष जीवात्मा के एक देह को छोड़कर अन्य शरीर में प्रवेश करने पर शोक नहीं करता।पुनर्जन्म के सिद्धान्त के पीछे छिपे इस सत्य को यह श्लोक और अधिक दृढ़ करता है। अत बुद्धिमान पुरुष के लिये मृत्यु का कोई भय नहीं रह जाता। बाल्यावस्था आदि की मृत्यु होने पर हम शोक नहीं करते क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा अस्तित्व बना रहता है और हम पूर्व अवस्था से उच्च अवस्था को प्राप्त कर रहे हैं। उसी प्रकार एक देह विशेष को त्याग कर जीवात्मा अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है।

English Translation By Swami Sivananda

Just as in this body the embodied (soul) passes into childhood, youth and old age, so also does it pass into another body; the firm man does not grieve thereat.

Transliteration

dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati

अनुवाद

जैसे इस शरीर में देहधारी आत्मा की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसे अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता।

भावार्थ

भगवान कृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का ज्ञान दे रहे हैं। वे समझाते हैं कि जैसे मनुष्य एक ही जीवन में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुजरता है, वैसे ही मृत्यु के बाद आत्मा नया शरीर धारण करती है। इसलिए ज्ञानी मनुष्य मृत्यु से शोक या मोह नहीं करते।

Translation

Just as the embodied soul continuously passes, in this body, from childhood to youth to old age, similarly it passes into another body at death. A wise person is not deluded by such a change.

Meaning

Lord Krishna imparts the knowledge of the soul’s immortality and the body’s transient nature to Arjuna. He explains that just as a person naturally transitions from childhood to youth and old age in one lifetime, the soul acquires a new body after death. Therefore, a wise person does not grieve or get deluded by the phenomenon of death.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
देहिनःदेहधारी आत्मा के
अस्मिन्इस
यथाजैसे
देहेशरीर में
कौमारम्बाल्यावस्था
यौवनम्युवावस्था
जरावृद्धावस्था
तथावैसे ही
देहान्तरदूसरे शरीर की
प्राप्तिःप्राप्ति
धीरःधीर पुरुष
तत्रउस विषय में
ननहीं
मुह्यतिमोहित होता है

Word by word

WordMeaning
dehinaḥof the embodied soul
asminin this
yathājust as
dehein the body
kaumāramchildhood
yauvanamyouth
jarāold age
tathāsimilarly
dehāntaraof another body
prāptiḥattainment
dhīraḥthe wise person
tatrain that matter
nanot
muhyatiis deluded