Chapter 2 · सांख्ययोग
Bhagavad Gita 2.11
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब हम अर्जुन के विषाद को ठीक से समझने का प्रयत्न करते हैं तब यह पहचानना कठिन नहीं होगा कि यद्यपि उसका तात्कालिक कारण युद्ध की चुनौती है परन्तु वास्तव में मानसिक संताप के यह लक्षण किसी अन्य गम्भीर कारण से हैं। जैसा कि एक श्रेष्ठ चिकित्सक रोग के लक्षणों का ही उपचार न करके उस रोग के मूल कारण को दूर करने का प्रयत्न करता है उसी प्रकार यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक मोह के मूल कारण (आत्मअज्ञान) को ही दूर करने का प्रयत्न करते हैं।शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति भी उत्पन्न कर देता है। अर्जुन की यह अहंकार बुद्धिया जीव बुद्धि कि वह शरीर मन और बुद्धि की उपाधियों से परिच्छिन्न या सीमित है वास्तव में मोह का कारण है जिससे स्वजनों के साथ स्नेहासक्ति होने से उनके प्रति मन में यह विषाद और करुणा का भाव उत्पन्न हो रहा है। वह अपने को असमर्थ और असहाय अनुभव करता है। मोहग्रस्त व्यक्ति को आसक्ति का मूल्य दुख और शोक के रूप में चुकाना पड़ता है। इन शरीरादि उपाधियों के साथ मिथ्या तादात्म्य के कारण हमें दुख प्राप्त होते रहते हैं। हमें अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का ज्ञान होने से उनका अन्त हो जाता है।नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा स्थूल शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य के कारण अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के सम्बन्ध में अपने को बन्धन में अनुभव करती है। वही आत्मतत्त्व मन के साथ अनेक भावनाओं का अनुभव करता है मानो वह भावना जगत् उसी का है। फिर यही चैतन्य बुद्धिउपाधि से युक्त होकर आशा और इच्छा करता है महत्वाकांक्षा और आदर्श रखता है जिनके कारण उसे दुखी भी होना पड़ता है। इच्छा महत्वाकांक्षा आदि बुद्धि के ही धर्म हैं।इस प्रकार इन्द्रिय मन और बुद्धि से युक्त शुद्ध आत्मा जीवभाव को प्राप्त करके बाह्य विषयों भावनाओं और विचारों का दास और शिकार बन जाती है। जीवन के असंख्य दुख और क्षणिक सुख इस जीवभाव के कारण ही हैं। अर्जुन इसी जीवभाव के कारण पीड़ा का अनुभव कर रहा था। श्रीकृष्ण जानते थे कि शोकरूप भ्रांति या विक्षेप का मूल कारण आत्मस्वरूप का अज्ञान आवरण है और इसलिये अर्जुन के विषाद को जड़ से हटाने के लिये वे उसको उपनिषदों में प्रतिपादित आत्मज्ञान का उपदेश करते हैं।मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधि के द्वारा मन को पुन शिक्षित करने का ज्ञान भारत ने हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दिया था। यहाँ श्रीकृष्ण का गीतोपदेश के द्वारा यही प्रयत्न है। आत्मज्ञान की पारम्परिक उपदेश विधि के अनुसार जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण सीधे ही आत्मतत्त्व का उपदेश करते हैं।भीष्म और द्रोण के अन्तकरण शुद्ध होने के कारण उनमें चैतन्य प्रकाश स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। वे दोनों ही महापुरुष अतुलनीय थे। इस युद्ध में मृत्यु हो जाने पर उनको अधोगति प्राप्त होगी यह विचार केवल एक अपरिपक्व बुद्धि वाला ही कर सकता है। इस श्लोक के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान जीव के उच्च स्वरूप की ओर आकर्षित करते हैं।हमारे व्यक्तित्व के अनेक पक्ष हैं और उनमें से प्रत्येक के साथ तादात्म्य कर उसी दृष्टिकोण से हम जीवन का अवलोकन करते हैं। शरीर के द्वारा हम बाह्य अथवा भौतिक जगत् को देखते हैं जो मन के द्वारा अनुभव किये भावनात्मक जगत् से भिन्न होता है और उसी प्रकार बुद्धि के साथ विचारात्मक जगत् का अनुभव हमें होता है।भौतिक दृष्टि से जिसे मैं केवल एक स्त्री समझता हूँ उसी को मन के द्वारा अपनी माँ के रूप में देखता हूँ। यदि बुद्धि से केवल वैज्ञानिक परीक्षण करें तो उसका शरीर जीव द्रव्य और केन्द्रक वाली अनेक कोशिकाओं आदि से बना हुआ एक पिण्ड विशेष ही है। भौतिक वस्तु के दोष अथवा अपूर्णता के कारण होने वाले दुखों को दूर किया जा सकता है यदि मेरी भावना उसके प्रति परिवर्तित हो जाये। इसी प्रकार भौतिक और भावनात्मक दृष्टि से जो वस्तु कुरूप और लज्जाजनक है उसी को यदि बुद्धि द्वारा तात्त्विक दृष्टि से देखें तो हमारे दृष्टिकोण में अन्तर आने से हमारा दुख दूर हो सकता है।इसी तथ्य को और आगे बढ़ाने पर ज्ञात होगा कि यदि मैं जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से देख सकूँ तो शारीरिक मानसिक और बौद्धिक दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न विषाद को आनन्द और प्रेरणादायक स्फूर्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। यहाँ भगवान् अर्जुन को यही शिक्षा देते हैं कि वह अपनी अज्ञान की दृष्टि का त्याग करके गुरुजन स्वजन युद्धभूमि इत्यादि को आध्यात्मिक दृष्टि से देखने और समझने का प्रयत्न करे।इस महान् पारमार्थिक सत्य का उपदेश यहाँ इतने अनपेक्षित ढंग से अचानक किया गया है कि अर्जुन की बुद्धि को एक आघातसा लगा। आगे के श्लोक पढ़ने पर हम समझेंगे कि भगवान् ने जो यह आघात अर्जुन की बुद्धि में पहुँचाया उसका कितना लाभकारी प्रभाव अर्जुन के मन पर पड़ा।इनके लिये शोक करना उचित क्यों नहीं है क्योंकि वे नित्य हैं। कैसे भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said Thou hast grieved for those that should not be grieved for, yet thou speakest words of wisdom. The wise grieve neither for the living nor for the dead.
Transliteration
śrī bhagavānuvāca
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और फिर भी तुम ज्ञानियों जैसी बातें करते हो। ज्ञानी जन न तो उनके लिए शोक करते हैं जिनके प्राण चले गए हैं, और न ही उनके लिए जिनके प्राण नहीं गए हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपना उपदेश देना आरम्भ करते हैं और उसके शोक के मूल कारण, अज्ञानता, पर प्रहार करते हैं। वे अर्जुन के व्यवहार में विरोधाभास दिखाते हैं कि वह ज्ञानियों जैसी बातें तो कर रहा है, लेकिन उन शरीरों के लिए शोक कर रहा है जो नाशवान हैं। कृष्ण यह मूलभूत आध्यात्मिक सत्य स्थापित करते हैं कि जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे आत्मा की अमरता को जानते हैं और इसलिए जीवित या मृत किसी के लिए भी शोक नहीं करते।
Translation
The Supreme Lord said: You are mourning for those who are not worthy of sorrow, and yet you speak words of wisdom. The wise do not grieve for the dead or for the living.
Meaning
In this verse, Lord Krishna begins His formal teachings to Arjuna by addressing the root cause of his sorrow: ignorance. He points out the contradiction in Arjuna’s behavior; while speaking like a learned man, he is mourning for the physical bodies of his relatives. Krishna establishes the fundamental spiritual truth that the wise, who understand the eternal nature of the soul, do not grieve for either the living or the dead.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्री भगवान् | भगवान |
| उवाच | बोले |
| अशोच्यान् | जो शोक करने योग्य नहीं हैं उनके लिए |
| अन्वशोचः | शोक कर रहे हो |
| त्वम् | तुम |
| प्रज्ञावादान् | ज्ञानियों जैसी बातें |
| च | और |
| भाषसे | बोल रहे हो |
| गतासून् | जिनके प्राण चले गए हैं (मृत) |
| अगतासून् | जिनके प्राण नहीं गए हैं (जीवित) |
| च | और |
| न | नहीं |
| अनुशोचन्ति | शोक करते हैं |
| पण्डिताः | ज्ञानी जन |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| aśocyān | for those not worthy of grief |
| anvaśocaḥ | you are mourning |
| tvam | you |
| prajñāvādān | words of wisdom |
| ca | and |
| bhāṣase | are speaking |
| gatāsūn | the dead (whose life breath has gone) |
| agatāsūn | the living (whose life breath has not gone) |
| ca | and |
| na | not |
| anuśocanti | lament |
| paṇḍitāḥ | the wise |