श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 2 · सांख्ययोग

Bhagavad Gita 2.10

मूल श्लोक :

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव) पूर्ण रूप से अपने सारथी भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि) की शरण में आत्मसमर्पण करता है  जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) द्वारा चालित रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं।ऐसे दुखी और भ्रमित व्यक्ति जीव  अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक मोह की निवृत्ति हो जाती है।उपनिषद् के रूपक को ध्यान में रखकर यदि हम संजय द्वारा चित्रित दृश्य का वर्णन उपर्युक्त प्रकार से करें तो इसमें हमें सनातन पारमार्थिक सत्य के दर्शन होंगे। जब जीव (अर्जुन) विषादयुक्त होकर शरीर में (देह) स्थित हो जाता है और सभी स्वार्थ पूर्ण कर्मों के साधनों (गाण्डीव) को त्यागकर इन्द्रियों को (श्वेत अश्व) मन की लगाम के द्वारा संयमित करता है तब सारथि (शुद्ध बुद्धि) जीव को धर्म शक्ति की सहायता से वह दैवी सार्मथ्य और मार्गदर्शन प्रदान करता है जिससे अधर्म की बलवान सेना को भी परास्त कर जीव सम्पूर्ण विजय को प्राप्त करता है।

English Translation By Swami Sivananda

To him who was despondent in the midst of the two armies, Krishna, as if smiling, O Bharata, spoke these words.

Transliteration

tam uvāca hṛṣīkeśaḥ prahasann iva bhārata
senayor ubhayor madhye viṣīdantam idaṃ vacaḥ

अनुवाद

हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! दोनों सेनाओं के मध्य में शोक करते हुए उस (अर्जुन) से हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने मानो हँसते हुए यह वचन कहा।

भावार्थ

इस श्लोक में संजय राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का दृश्य बता रहे हैं। दोनों सेनाओं के बीच अर्जुन को शोक और मोह से ग्रस्त देखकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं। उनकी यह मुस्कान उनके ईश्वरीय आत्मविश्वास को दर्शाती है और यहीं से भगवद्गीता के महान आध्यात्मिक उपदेश का आरंभ होता है।

Translation

O descendant of Bharata (Dhritarashtra), Hrishikesha (Krishna), smiling as it were, spoke these words to him (Arjuna) who was lamenting in the midst of the two armies.

Meaning

In this verse, Sanjaya describes the scene to King Dhritarashtra. Seeing Arjuna overwhelmed with grief and confusion between the two massive armies, Lord Krishna smiles affectionately. This smile signifies Krishna’s divine confidence and sets the stage for the profound spiritual teachings of the Bhagavad Gita that are about to follow.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तम्उस (अर्जुन) को
उवाचकहा
हृषीकेशःहृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने
प्रहसन्हँसते हुए
इवमानो
भारतहे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)
सेनयोःसेनाओं के
उभयोःदोनों
मध्येबीच में
विषीदन्तम्शोक करते हुए
इदम्यह
वचःवचन

Word by word

WordMeaning
tamto him (Arjuna)
uvācaspoke
hṛṣīkeśaḥHrishikesha (Krishna)
prahasansmiling
ivaas if
bhārataO descendant of Bharata (Dhritarashtra)
senayoḥof the armies
ubhayoḥof both
madhyein the middle
viṣīdantamlamenting
idamthis
vacaḥword