श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.8

मूल श्लोक :

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो कुछ कर्म है? वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे? तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्म को दुखदायक समझकर कायाक्लेश के भय से त्याग दे? तो उसका त्याग राजस कहा जायेगा। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कर्तव्य कर्म दुखदायक और थकाने वाले न हों? तो रजोगुणी पुरुष उन्हें करने में तत्पर रहेगा? परन्तु कर्मशील पुरुष होकर जो अपनी व्यक्तिगत सुखसुविधाओं का त्याग नहीं कर सकता? उसे श्रेष्ठ और साहसी पुरुष कदापि नहीं कहा जा सकता। ऐसे कर्मों का कोई विशेष पुरस्कार नहीं मिलता। भगवान् तो कहते हैं? वह अपने त्याग का कोई फल प्राप्त नहीं करता है।वस्तुत अपने कर्तव्यों का पालन ही महानतम त्याग है? और विशेषत तब वह और भी अधिक श्रेष्ठ बन जाता है? जब मनुष्य को अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का भी त्याग करना पड़ता है। स्वयं अर्जुन भी युद्ध करने में संकोच करके अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा था। इस प्रकार? उसका त्याग राजस श्रेणी का ही कहा जा सकता था।वास्तविक त्याग हमें सदैव आत्माभिव्यक्ति के विशालतर क्षेत्र में पहुँचाता है? जहाँ हम श्रेष्ठतर दिव्य आनन्द का अनुभव कर सकते हैं। त्याग के द्वारा ही एक कली खिलकर फूल बन जाती है? और वह फूल अपनी कोमल पंखुड़ियों और मनमोहक सुगन्ध का त्याग कर ही फल के सम्पन्न पद को प्राप्त होता हैं।

English Translation By Swami Sivananda

He who abandons action on account of the fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by doing such Rajasic renunciation.

Transliteration

duḥkham ity eva yat karma kāyakleśabhayāt tyajet
sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet

अनुवाद

जो कोई भी कर्तव्य कर्म को दुःख रूप ही समझकर, शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को कभी प्राप्त नहीं करता।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण राजस त्याग की परिभाषा दे रहे हैं। जब कोई व्यक्ति अपने नियत कर्तव्यों को केवल इसलिए छोड़ देता है क्योंकि वे शारीरिक रूप से कष्टदायक या कठिन लगते हैं, तो ऐसा त्याग रजोगुण से प्रेरित होता है। इस प्रकार के त्याग से मनुष्य को वास्तविक त्याग (ज्ञान और शांति) का फल प्राप्त नहीं होता।

Translation

He who abandons prescribed duty merely because it is difficult or out of fear of bodily discomfort, performs a rajasika (passionate) abandonment and does not obtain the fruit of renunciation.

Meaning

In this verse, Lord Krishna defines the rajasika (passionate) form of renunciation. When someone abandons their prescribed duties simply because they seem physically painful or difficult, such renunciation is driven by the mode of passion. Such a person does not attain the true spiritual fruit of renunciation, which is peace and liberation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
दुःखम्दुःख रूप
इतिइस प्रकार
एवही
यत्जो
कर्मकर्तव्य कर्म को
काय-क्लेश-भयात्शारीरिक कष्ट के भय से
त्यजेत्त्याग दे
सःवह
कृत्वाकरके
राजसम्राजस
त्यागम्त्याग को
ननहीं
एवही
त्याग-फलम्त्याग के फल को
लभेत्प्राप्त करता है

Word by word

WordMeaning
duḥkhampainful
itithus
evaonly
yatwhich
karmaduty
kāya-kleśa-bhayātout of fear of bodily discomfort
tyajetone abandons
saḥhe
kṛtvāperforming
rājasamrajasika (in the mode of passion)
tyāgamrenunciation
nanot
evacertainly
tyāga-phalamthe fruit of renunciation
labhetobtains