श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.77

मूल श्लोक :

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दर्शाया था जिसका यहाँ संजय स्मरण कर रहा है। सहृदय व्यक्ति के लिए यह विश्वरूप इतना ही प्रभावकारी है? जितना कि गीता का ज्ञान एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए अविस्मरणीय है। वेदों में वर्णित विराट् पुरुष का दर्शन चौंका देने वाला है और गीता में? निसन्देह वह अति प्रभावशाली है। परन्तु कोई आवश्यक नहीं है कि यह महर्षि व्यास जी की केवल काव्यात्मक कल्पना ही हो दूसरे भी अनेक लोग हैं? जिनके अनुभव भी प्राय इसी के समान ही हैं।यदि गीता का तत्त्वज्ञान? मानव जीवन के गौरवशाली प्रयोजन को उद्घाटित करते हुए मनुष्य के बौद्धिक पक्ष को अनुप्राणित और हर्षित करता है? तो प्रत्येक नामरूप? अनुभव और परिस्थिति में मन्दस्मित वृन्दावनबिहारी भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन प्रेमरस से मदोन्मत्त भक्तों के हृदयों को जीवन प्रदायक हर्ष से आह्लादित कर देता है।मेरा ऐसा विचार है कि यदि संजय को स्वतन्त्रता दी जाती? तो उसने श्रीमद्भगवद्गीता पर एक सम्पूर्ण संजय गीता की रचना कर दी होती  जब ज्ञान के मौन से बुद्धि हर्षित होती है? और प्रेम के आलिंगन में हृदय उन्मत्त होता है? तब मनुष्य अनुप्राणित कृतकृत्यता के भाव में आप्लावित हो जाता है।कृतकृत्यता के सन्तोष का वर्णन करने में भाषा एक दुर्बल माध्यम है इसलिए? अपनी मन की प्रबलतम भावना का और अधिक विस्तार किये बिना? संजय अपने दृढ़विश्वास को? गीता के इस अन्तिम एक श्लोक में? सारांशत घोषित करता है

English Translation By Swami Sivananda

And, remembering again and again, also that most wonderful form of Hari, great is my wonder, O King; and I rejoice again and again.

Transliteration

tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ
vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ

अनुवाद

और हे राजन! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके मुझे महान आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ

भावार्थ

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि भगवान कृष्ण के उस अत्यंत अलौकिक और विराट रूप का स्मरण करके वे विस्मय से भर जाते हैं। यह अलौकिक अनुभव उन्हें केवल आश्चर्यचकित ही नहीं करता, बल्कि उनके हृदय को परम आनंद और रोमांच से भी भर देता है। वे इस दिव्य दर्शन के प्रभाव को बार-बार महसूस कर रहे हैं।

Translation

And, O King, remembering and remembering that most wonderful form of Sri Hari, great is my amazement, and I rejoice again and again

Meaning

Sanjaya expresses to Dhritarashtra his profound awe upon recalling the cosmic, wondrous form of Lord Krishna. This divine memory not only leaves him utterly amazed but also fills his heart with repeated waves of spiritual ecstasy. He is deeply moved by the privilege of having witnessed such a supreme manifestation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तत्उस
चऔर
संस्मृत्यस्मरण करके
संस्मृत्यबार-बार स्मरण करके
रूपम्रूप को
अतिअत्यंत
अद्भुतम्अद्भुत
हरेःश्रीहरि के
विस्मयःआश्चर्य
मेमेरा / मुझे
महान्महान
राजन्हे राजन (धृतराष्ट्र)
हृष्यामिमैं हर्षित हो रहा हूँ
चऔर
पुनःबार-बार
पुनःफिर से

Word by word

WordMeaning
tatthat
caand
saṃsmṛtyaremembering
saṃsmṛtyaremembering repeatedly
rūpamform
atiextremely
adbhutamwonderful
hareḥof Lord Hari (Krishna)
vismayaḥwonder / amazement
memy / to me
mahāngreat
rājanO King
hṛṣyāmiI rejoice
caand
punaḥagain
punaḥagain