Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.74
मूल श्लोक :
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
गीतोपदेश का प्रारम्भ होने के पूर्व? अर्जुन ने कहा था? मैं युद्ध नहीं करूंगा। और? उपदेश की समाप्ति पर उसने? पूर्व श्लोक में? यह घोषणा की? मैं आपके वचन का पालन करूंगा। इस प्रकार रोग का उपचार पूर्ण हुआ और उसके साथ ही गीताशास्त्र की परिसमाप्ति होती है। इस सन्दर्भ में? ईसामसीह के कथन का स्मरण होता है। प्राणदण्ड की शूली को ढोते हुए वे जा रहे थे लोगों की व्यंगोक्तियों से क्षणभर के लिये वे अर्जुन की स्थिति में पहुंच गये। परन्तु? तत्काल मोह मुक्त होकर उन्होंने घोषणा की हे प्रभु आपकी इच्छा पूर्ण होगी। अर्जुन के और ईसामसीह के वाक्यों में कितनी साम्यता है।मैंने भगवान् वासुदेव और अर्जुन का संवाद सुना अध्यात्म की सांकेतिक भाषा के अनुसार वासुदेव का अर्थ है? सर्वव्यापी चैतन्यस्वरूप आत्मा तथा पार्थ का अर्थ है? जड़ उपाधियों से तादात्म्य किया जीव। जब यह जीव इस मिथ्या तादात्म्य का परित्याग कर देता है? तब वह अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है। आत्मानात्म के विवेक की कला ही गीताशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है।अद्भुत श्रीकृष्णार्जुन के संवाद रूप में श्रवण किये गये तत्त्वज्ञान को? संजय? अद्भुत और विस्मयकारी विशेषण देता है। सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ग्राह्य होने के कारण कोई भी दर्शनशास्त्र आश्चर्यमय नहीं होता है। परन्तु गीता के तत्त्वज्ञान की अद्भुतता भी कुछ अपूर्व ही है। जो अर्जुन पूर्णतया विघटित और विखण्डित हो चुका था? वही अर्जुन इस ज्ञान को प्राप्त कर सुगठित? पूर्ण और शक्तिशाली बन गया। यह एक उदाहरण ही गीता की कल्याणकारी शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी कारण गीता को एक अनन्य और अलौकिक आभा प्राप्त हुई है।गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का स्वामी है? दास नहीं। उसमें स्वामित्व की यह क्षमता पहले से ही विद्यमान है। जब यह सत्य उद्घाटित किया जाता है? तब संजय के लिए यह स्वाभाविक है कि वह आनन्दविभोर होकर इसे अद्भुत कह उठे।महात्मा अर्जुन संजय इस श्लोक में अर्जुन को गौरवान्वित करता है? पार्थसारथि भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं। भाव यह है कि यदि कोई छोटा बालक कठिन काम करके दिखाता है? तो वह स्तुति और अभिनन्दन का पात्र होता है। परन्तु वही कार्य कोई नवयुवक कर के दिखाये? तो उसमें कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं होती। इसी प्रकार? सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण के लिए गीता का उपदेश देना बच्चों का खेल है? जबकि मोह और भ्रम में फँसे हुए अर्जुन का उस स्थिति से बाहर निकल कर आना? वास्तव में एक उपलब्धि है। उसका यह साहस और वीरत्व प्रशंसनीय है।संजय की सहानुभूति सदैव पाण्डवों के साथ ही थी। परन्तु वह धृतराष्ट्र का नमक खा रहा था? इसलिए अपने स्वामी के साथ निष्ठावान रहना उसका कर्तव्य था। उस समय की राजनीति के अनुसार केवल धृतराष्ट्र ही इस युद्ध को रोक सकता था और? इसलिए? संजय यथासंभव सूक्ष्म संकेत करता है कि अर्जुन पुन अपनी वीरतपूर्ण स्थिति में आ गया है? जिसका परिणाम होगा धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्रों का विनाश? वृद्धावस्था में पुत्रवियोग की पीड़ा और असम्मान का कलंकित जीवन। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि लड़खड़ाते धृतराष्ट्र की अन्धता केवल नेत्रों की ही नहीं? वरन् मन और बुद्धि की भी थी? क्योंकि संजय के अनुनय विनय के नैतिक संकेतों का उस अन्ध राजा के बधिर कानों पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है।महर्षि वेदव्यास के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करते हुए संजय कहता है
English Translation By Swami Sivananda
Sanjaya said Thus I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes the hair to stand on end.
Transliteration
sañjaya uvāca
ityahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ
saṃvādamimamaśrauṣamadbhutaṃ romaharṣaṇamअनुवाद
संजय ने कहा — इस प्रकार मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचकारी संवाद को सुना
भावार्थ
यह भगवद्गीता का उपसंहार भाग है जहाँ संजय धृतराष्ट्र को अपना अनुभव बता रहे हैं। संजय व्यास देव की कृपा से प्राप्त दिव्य दृष्टि के माध्यम से इस संवाद को प्रत्यक्ष सुन पाए थे। वे इस संवाद को अत्यंत विस्मयकारी और रोमांच उत्पन्न करने वाला बताते हैं।
Translation
Sanjaya said: Thus I have heard this wonderful and hair-raising conversation between Vāsudeva and the high-souled Pārtha
Meaning
This is the concluding section of the Bhagavad Gita where Sanjaya shares his personal experience with Dhritarashtra. Through the divine vision granted by Vyasadeva, Sanjaya was able to hear this dialogue directly. He describes the conversation as wondrous and so thrilling that it makes his hair stand on end.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सञ्जयः | संजय |
| उवाच | ने कहा |
| इति | इस प्रकार |
| अहम् | मैंने |
| वासुदेवस्य | वासुदेव (श्रीकृष्ण) का |
| पार्थस्य | पार्थ (अर्जुन) का |
| च | और |
| महा-आत्मनः | महात्मा (उच्च विचार वाले) |
| संवादम् | संवाद को |
| इमम् | इस |
| अश्रौषम् | सुना |
| अद्भुतम् | अद्भुत |
| रोम-हर्षणम् | रोमांचकारी (रोंगटे खड़े कर देने वाला) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sañjayaḥ | Sanjaya |
| uvāca | said |
| iti | thus |
| aham | I |
| vāsudevasya | of Vāsudeva (Krishna) |
| pārthasya | of Pārtha (Arjuna) |
| ca | and |
| mahā-ātmanaḥ | of the high-souled |
| saṃvādam | conversation |
| imam | this |
| aśrauṣam | have heard |
| adbhutam | wonderful |
| roma-harṣaṇam | hair-raising |