श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.73

मूल श्लोक :

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अर्जुन बोले -- हे अच्युत आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अर्जुन स्वीकार करता है कि उसका मोह नष्ट हो गया है। मुझे स्मृति प्राप्त हो गयी है  इस वाक्य से यह दर्शाया गया है कि उसके मोह की निवृत्ति भगवान् के उपदेश को केवल अन्धश्रद्धा से ग्रहण कर लेने में नहीं हुई है? वरन् पूर्ण विचार करके प्राप्त ज्ञान से हुई है। उसके अन्दर का वीरत्व जागृत हो गया है और उसका सम्मोहावस्था समाप्त हो गयी है।जब हम गीता दर्शन के वास्तविक अभिप्राय को पूर्णतया समझ लेते हैं? केवल तभी हम में ज्ञान की जागृति होती है और हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाते हैं। पूर्णत्व तो हमारा आत्मस्वरूप ही है। उसे किसी देशान्तर या कालान्तर में किसी बाह्य शक्ति के हस्तक्षेप की सहायता से प्राप्त नहीं करना है। केवल अज्ञान के कारण हम स्वयं को जीव समझ कर दुख और कष्ट भोग रहे हैं। जीव दशा के कष्टों को भोगते समय भी वस्तुत हम पूर्ण आत्म स्वरूप ही होते हैं। अत आवश्यकता केवल सम्यक् आत्मज्ञान की ही है? आत्मा तो नित्योपलब्ध स्वरूप ही है। मनुष्य का देवत्व जागृत होने से उसके अन्दर का पशुत्व समाप्त हो जाता है।अपूर्ण ज्ञान की स्थिति में ही मन में शोक? मोह? भय? निराशा? दुर्बलता आदि अनेक सन्देह उत्पन्न होते हैं। अब? अर्जुन को पूर्ण ज्ञान होने के कारण वह सन्देह रहित (गतसन्देह) भी हो गया है। आत्मज्ञान की दृष्टि से? युद्धभूमि का पुनर्निरीक्षण एवं पुनर्मूल्यांकन करने पर उसे? अब? अपने कर्तव्य को निश्चित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। वह अपने निर्णय की स्पष्ट घोषणा करता है? मैं आपके आदेश का पालन करूंगा। आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण ही विशुद्ध बुद्धि के रूप में व्यक्त होते हैं। अत समस्त साधकों को अपने अहंकार का त्याग करके अपनी विशुद्ध बुद्धि के निर्णयों का सदैव पालन करना चाहिए। यही आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ है? और समापान भी।यहाँ गीताशास्त्र की परिसमाप्ति होती है। अब? गीताचार्य और गीता की स्तुति करते हुए तथा महाभारत की कथा का संबंध बताते हुए

English Translation By Swami Sivananda

Arjuna said  Destroyed is my delusion as I have gained my knowledge (memory) through Thy grace, O Krishna. I remain freed from doubts. I will act according to Thy word.

Transliteration

arjuna uvāca
naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta
sthito'smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava

अनुवाद

अर्जुन ने कहा — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई है। अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

भावार्थ

यह भगवद्गीता का अंतिम श्लोक है जिसमें अर्जुन बोलते हैं। कृष्ण के उपदेश को सुनने के बाद, अर्जुन का अज्ञान और भ्रम पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। वे अपने वास्तविक स्वरूप और कर्तव्य को पहचान लेते हैं और युद्ध करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

Translation

Arjuna said: My delusion is destroyed and memory has been regained by me through Your grace, O Infallible One. I am now firm and free from doubt; I shall act according to Your word.

Meaning

This is the final verse spoken by Arjuna in the Bhagavad Gita. After hearing Krishna’s teachings, Arjuna’s ignorance and delusion are completely dispelled. He regains his spiritual memory and readiness to perform his duty, submitting entirely to the divine will.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अर्जुनःअर्जुन
उवाचने कहा
नष्टःनष्ट हो गया है
मोहःमोह (अज्ञान)
स्मृतिःस्मृति (आत्मज्ञान)
लब्धाप्राप्त हो गई है
त्वत्-प्रसादात्आपकी कृपा से
मयामेरे द्वारा
अच्युतहे अच्युत (अविनाशी)
स्थितःस्थित
अस्मिमैं हूँ
गत-सन्देहःसंशयों से रहित होकर
करिष्येमैं करूँगा
वचनम्आज्ञा का पालन
तवआपकी

Word by word

WordMeaning
arjunaḥArjuna
uvācasaid
naṣṭaḥdestroyed
mohaḥdelusion
smṛtiḥmemory (of self-realization)
labdhāregained
tvat-prasādātby your grace
mayāby me
acyutaO infallible one
sthitaḥsituated (firm)
asmiI am
gata-sandehaḥfree from doubts
kariṣyeI will do
vacanamword (instruction)
tavayour