श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.72

मूल श्लोक :

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पृथानन्दन क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन से प्रश्न पूछकर यह जानना चाहते हैं कि उनके उपदेश से वह कितना लाभान्वित हुआ है। यद्यपि उन्हें अपने उपदेश की अमोघता के प्रति कोई सन्देह नहीं था? तथापि वे किसी सफल चिकित्सक के समान? भवरोग से पीड़ित अर्जुन के ही प्रसन्न मुख से स्वास्थ्य लाभ की वार्ता सुनना चाहते हैं।क्या तुमने मेरे उपदेश को एकाग्र चित्त होकर सुना   यह प्रश्न ही सूक्ष्म रूप से दर्शाता है कि यदि तुमने एकाग्रचित्त से वस्तुओं? व्यक्तियों और परिस्थितियों की कारण परम्परा का श्रवण किया होगा? तो इस ज्ञान को पूर्णतया समझा भी होगा। वेदान्त का अध्ययन हमारी दृष्टि को व्यापक और विशाल बनाता है। इस ज्ञान के प्रकाश में हम पूर्व परिचित जगत् को ही नवीन दृष्टिकोण से पहचानने लगते हैं। इस नवीन दृष्टि में जगत् की पूर्वपरिचित समस्त कुरूपताएं लुप्त हो जाती हैं।क्या तुम्हारा अज्ञान जनित संमोह नष्ट हो गया   स्वस्वरूप के अज्ञान के कारण हमारे मन में अनेक मिथ्या धारणाएं दृढ़ हो जाती हैं। इन्हीं के कारण जगत् की ओर देखने का हमारा दृष्टिकोण विकृत हो जाता है और उस स्थिति में हमारे निर्णय भी त्रुटिपूर्ण सिद्ध होते हैं। अर्जुन इसी अज्ञानजनित संभ्रम से पीड़ित था? जिसका विस्तृत वर्णन गीता के प्रारम्भिक अध्यायों में किया गया है।शरीर के रक्षार्थ किसी विषाक्त या दूषित अंग का छेदन करना कोई अपराध नहीं है? वरन् वह शरीर के लिए जीवन प्रदायक वरदान है। सांस्कृतिक अधपतन के उस काल में कौरवों ने धर्म और संस्कृति के विरुद्ध शस्त्र उठाये थे। उस समय धर्म की रक्षा के लिए वीर अर्जुन का आह्वान किया गया था। परन्तु अज्ञानजनित संमोह के वशीभूत? अर्जुन सम्पूर्ण स्थिति का ही त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करके युद्ध से विरत होने लगा। इस भ्रम का कारण सत्य का अज्ञान था। यथार्थ ज्ञान से यह अज्ञान अपने सम्पूर्ण विकारों (विपरीत धारणाओं) के साथ तत्काल समाप्त हो जाता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण के प्रश्न का औचित्य सिद्ध होता है।सत्य का ज्ञान मनुष्य की कर्म कुशलता के रूप में व्यक्त होता है और उसकी पूर्णता समाज की सेवा में ही है। यदि अर्जुन ने भगवान् के उपदेश को समझ लिया है? तो वह चुनौती का सामना करने में कदापि संकोच नहीं करेगा। यही भगवान् के मन का अकथित अभिप्राय प्रतीत होता है।भगवान् के प्रश्न का उत्तर देते हुए

English Translation By Swami Sivananda

Has this been heard, O Arjuna, with one-pointed mind? Has the delusion of thy ignorance been destroyed, O Dhananjaya?

Transliteration

kaccidetacchrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā
kaccidajñānasaṃmohaḥ pranaṣṭaste dhanañjaya

अनुवाद

हे पार्थ! क्या तुमने इस (ज्ञान) को एकाग्र चित्त से सुना है? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया है?

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि क्या उन्होंने इस परम गोपनीय ज्ञान को पूरी एकाग्रता के साथ सुना है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या अर्जुन का अज्ञान और उससे उत्पन्न मोह अब पूरी तरह से समाप्त हो गया है। यह गुरु द्वारा शिष्य की समझ और मानसिक स्थिति की पुष्टि करने का एक सुंदर उदाहरण है।

Translation

O Partha, has this been heard by you with an attentive mind? O Dhananjaya, has your delusion born of ignorance been destroyed?

Meaning

In this verse, Lord Krishna asks Arjuna if he has listened to this supreme knowledge with undivided attention. He also inquires whether Arjuna’s delusion, which arose from ignorance, has now been completely destroyed. This represents a compassionate teacher ensuring that the disciple has fully understood the teachings before the dialogue concludes.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कच्चित्क्या
एतत्यह
श्रुतम्सुना गया
पार्थहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
त्वयातुम्हारे द्वारा
एकाग्रेणएकाग्र
चेतसाचित्त से
कच्चित्क्या
अज्ञान-संमोहःअज्ञान जनित मोह
प्रनष्टःनष्ट हो गया है
तेतुम्हारा
धनञ्जयहे धनंजय (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
kaccitwhether
etatthis
śrutamheard
pārthaO Partha (Arjuna)
tvayāby you
ekāgreṇawith one-pointed / attentive
cetasāmind
kaccitwhether
ajñāna-saṃmohaḥdelusion born of ignorance
pranaṣṭaḥdestroyed
teyour
dhanañjayaO Dhananjaya (conqueror of wealth)