Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.71
मूल श्लोक :
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीताग्रन्थको सुन भी लेगा? वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
गीता का विषय दूर से दर्शन करके केवल प्रशंसा करने योग्य नहीं है। गीतोपदिष्ट ज्ञान से पूर्णतया लाभान्वित होने के लिए साधक का व्यक्तित्व सभी स्तरों पर सुगठित होना आवश्यक है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ दो गुणों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं जिनसे सम्पन्न श्रोता को श्रवण का सर्वाधिक आनन्द प्राप्त होगा।श्रद्धावान् श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं है। बुद्धि की वह क्षमता श्रद्धा है? जिसके द्वारा मनुष्य (1) शास्त्रीय शब्दों के सूक्ष्म आशय को समझ पाता है? (2) समझकर उनको धारण कर सकता है (3) उन्हें पूर्णतया आत्मसात् करने में समर्थ होता है और? (4) इस प्रकार? प्राप्त ज्ञान के अनुसार अपने जीवन को निर्मित कर सकता है। स्वाभाविक है कि श्रद्धावान् पुरुष गुरु के उपदेश से सर्वाधिक लाभान्वित होता है। अज्ञात वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उचित प्रमाण की आवश्यकता होती है और उस प्रमाण के सत्यत्व के विषय में विश्वास की भी। उस विश्वास के बिना ज्ञान की ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। प्रमाण में यह विश्वास श्रद्धा कहलाता है।अनसुयु जैसा कि अनेक स्थानों पर कहा जा चुका है? अनसुयु का अर्थ है वह पुरुष जो गुणों में दोष नहीं देखता है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हिन्दू धर्म में दर्शनशास्त्र के अध्येताओं को समीक्षा या समालोचना करने की स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की गई है। इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि शास्त्र के श्रवण या अध्ययन के पूर्व ही हमें उसके विषय में पूर्वाग्रह नहीं बना लेने चाहिए। पूर्वाग्रहों से दूषित बुद्धि सत्य का यथार्थ ज्ञान कदापि नहीं प्राप्त कर सकती।उक्त दोनों गुणों से सम्पन्न श्रोता को सर्वाधिक लाभ होगा। वह पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्मी लोगों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है। इसका अर्थ यह है कि ऐसा श्रोता पुरुष अपनी वासनाओं से मुक्त होकर आंतरिक शांति और आनन्द का अनुभव करता है। आनन्द का साम्राज्य हमारे हृदय में ही स्थित है। उसकी प्राप्ति के लिए सुदूर स्थित कहीं स्वर्ग में जाने की आवश्यकता नहीं है। अभी और यहीं आनन्द की प्राप्ति होती है यह वेदान्त का सत्य वचन है।आचार्य का यह कर्तव्य है कि वह यह देखें कि शिष्य ने यथावत् ज्ञान ग्रहण किया है अथवा नहीं। यदि उपदिष्ट साधन मार्ग शिष्य की उन्नति के लिए अनुकूल या पर्याप्त नहीं है? तो आचार्य को ऐसे शिष्य की सहायता करनी चाहिए जिससे कि वह शिष्य अपना सन्तुलन प्राप्त कर सके।इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Also the man who hears this, full of faith and free from malice, he, too, liberated, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds.
Transliteration
śraddhāvān anasūyaś ca śṛṇuyād api yo naraḥ
so 'pi muktaḥ śubhāñ lokān prāpnuyāt puṇyakarmaṇāmअनुवाद
जो मनुष्य श्रद्धावान् और दोष-दृष्टि से रहित होकर इस गीता-संवाद को केवल सुनेगा भी, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता के श्रवण मात्र की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य इस ज्ञान को पूरी तरह समझ न भी पाए, परंतु केवल श्रद्धा और ईर्ष्या-रहित भाव से इसे सुनता है, तो भी वह पवित्र हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मृत्यु के पश्चात उन उच्च और दिव्य लोकों को प्राप्त करता है जो पुण्य आत्माओं के लिए आरक्षित हैं।
Translation
And the person who listens to this with faith and without malice, even he, being liberated from sins, shall attain the auspicious worlds of those who perform righteous deeds.
Meaning
In this verse, Lord Krishna declares the immense merit of merely listening to the sacred dialogue of the Gita. He states that even if a person cannot fully assimilate or practice the teachings, simply hearing them with faith and without envy purifies them. Such an individual is freed from negative reactions and attains the higher, auspicious realms reserved for virtuous souls.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रद्धावान् | श्रद्धावान् |
| अनसूयः | दोष-दृष्टि से रहित (ईर्ष्या-रहित) |
| च | और |
| शृणुयात् | सुनेगा |
| अपि | भी |
| यः | जो |
| नरः | मनुष्य |
| सः | वह |
| अपि | भी |
| मुक्तः | मुक्त होकर |
| शुभान् | शुभ (मंगलमय) |
| लोकान् | लोकों को |
| प्राप्नुयात् | प्राप्त करेगा |
| पुण्य-कर्मणाम् | पुण्य कर्म करने वालों के |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śraddhāvān | full of faith |
| anasūyaḥ | free from malice (envy) |
| ca | and |
| śṛṇuyāt | hears |
| api | even |
| yaḥ | who |
| naraḥ | man |
| saḥ | he |
| api | also |
| muktaḥ | liberated |
| śubhān | auspicious |
| lokān | worlds |
| prāpnuyāt | shall attain |
| puṇya-karmaṇām | of those who perform righteous deeds |