श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.69

मूल श्लोक :

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यह भी आचार्य की स्तुति है। यहाँ भगवान् बताते हैं कि किस प्रकार ऐसा श्रेष्ठ आचार्य भगवत्स्वरूप को प्राप्त होता है। गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं? उसके तुल्य इस जगत् में मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला और कोई नहीं है। केवल इतना ही नहीं? अपितु भविष्य में भी? उससे अधिक मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर कोई न होगा।सम्पूर्ण गीता? में अनेक स्थानों पर इस मनोवैज्ञानिक सत्य को दोहराया गया है कि ध्येयवस्तु से भिन्न समस्त वृत्तियों का परित्याग करके यदि कोई साधक अपने मन को ध्येयवस्तु में एकाग्र या समाहित कर लेता है? तो वह स्वयं ध्येयस्वरूप बनकर अनन्त आत्मा का अनुभव कर सकता है। जो साधक गीता के अध्ययन और चिन्तनमनन में ही अपने समय का सदुपयोग करता है तथा उसी का प्रचार प्रसार करता है? तो उसके मन में उस ज्ञान के प्रति अत्यधिक आदर और सम्मान जागृत होता है। फलत? वह उसके सारतत्त्व से तादात्म्य करके परम शान्ति का अनुभव करता है? जो परमात्मा का स्वरूप ही है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं? ऐसे पुरुष से बढ़कर मेरा कोई प्रिय नहीं है क्योंकि वह ईश्वर के स्वरूप के ज्ञान का प्रचार करता है। इससे अधिक मेरा अतिशय प्रिय कार्य कोई नहीं है।इस सन्दर्भ में? यह ध्यान रहे कि गीताज्ञान के प्रचार के लिए हमें स्वयं उसमें पूर्ण प्रवीणता प्राप्त करने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ ज्ञान हम ग्रहण कर पाते हैं? उसका तत्काल ही प्रेमपूर्वक प्रचार ऐसे लोगों में करना चाहिए? जो इस विषय से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। प्रचार के साथ ही? हमें इस ज्ञान के अनुसार ही जीवन यापन करना चाहिए  ऐसा पुरुष मुझे अतिशय प्रिय है। यह भगवान् श्रीकृष्ण का आश्वासन है।न केवल उपदेशक? वरन् इस ज्ञान का निष्ठावान् जिज्ञासु विद्यार्थी भी अभिनन्दन का पात्र है। भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Nor is there any among men who does dearer service to Me, nor shall there be another on earth dearer to Me than he.

Transliteration

na ca tasmān manuṣyeṣu kaścin me priyakṛttamaḥ
bhavitā na ca me tasmād anyaḥ priyataro bhuvi

अनुवाद

और मनुष्यों में न तो उससे बढ़कर मेरा कोई अत्यंत प्रिय कार्य करने वाला है, और न ही पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा कोई अन्य अत्यंत प्रिय होगा।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस भक्त की महिमा गा रहे हैं जो गीता के इस परम रहस्यमय ज्ञान का प्रचार दूसरों में करता है। वे कहते हैं कि ऐसा प्रचारक उनका सबसे प्रिय सेवक है। भविष्य में भी पृथ्वी पर उससे बढ़कर कोई अन्य उन्हें प्रिय नहीं होगा।

Translation

And among men, there is none who performs a more dear service to Me than he, nor shall there ever be another on earth more dear to Me than he.

Meaning

In this verse, Lord Krishna glorifies the devotee who preaches this supreme and confidential knowledge of the Gita to others. He declares that no one performs a service more dear to Him than such a person. Furthermore, there will never be anyone on earth more beloved to Him in the future.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
नन
चऔर
तस्मात्उससे बढ़कर
मनुष्येषुमनुष्यों में
कश्चित्कोई भी
मेमेरा
प्रियकृत्तमःअत्यंत प्रिय कार्य करने वाला
भविताहोगा
ननहीं
चऔर
मेमेरा
तस्मात्उससे बढ़कर
अन्यःदूसरा
प्रियतरःअधिक प्रिय
भुविपृथ्वी पर

Word by word

WordMeaning
nanot
caand
tasmātthan him
manuṣyeṣuamong men
kaścitanyone
meto Me
priyakṛttamaḥone who performs the most dear service
bhavitāwill be
nanot
caand
meto Me
tasmātthan him
anyaḥother
priyataraḥdearer
bhuvion earth