श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.68

मूल श्लोक :

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति
भक्ितं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद(गीताग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा? वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण इस विचाराधीन श्लोक में ज्ञान प्रदाता आचार्य की स्तुति करते हैं। जो आचार्य गीतोपदिष्ट ज्ञान की यथार्थ व्याख्या करके श्रोतृ वर्ग को श्रीकृष्ण की जीवन पद्धति में प्रवृत्त कर सकता है? वही श्रेष्ठ उपदेष्टा है। आन्तरिक हो या बाह्य? अवगुण का नाश करो। यही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रमुख सिद्धांत है। ऐसे शक्तिशाली सिद्धांत पर निर्मित संस्कृति का प्रचार करने के लिए केवल पाण्डित्य ही पर्याप्त नहीं? वरन् उस आचार्य में श्रीकृष्ण की क्षमता भी आवश्यक है। इसलिए वे श्रेष्ठ आचार्य को गौरवान्वित करते हैं। जिन साधकों में सम्पूर्ण और शक्तिशाली जीवन जीने की आध्यात्मिक पिपासा है? उन्हें भगवद्गीता विशेष आकर्षक और अर्थवान् प्रतीत होती है। अत? यहाँ कहते हैं? इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश ऐसे भक्तों को देना चाहिए। भक्ति का अर्थ है आदर्श के साथ तादात्म्य। जो भक्तगण गीतोपदिष्ट जीवन पद्धति के साथ तादात्म्य स्थापित करके तदनुसार अपना जीवन निर्मित कर सकते हैं? वे इस ज्ञान के अधिकारी हैं।यदि शिष्य साधन भक्ति से युक्त होना चाहिए तो गुरु को परम भक्त अर्थात् पराभक्ति से युक्त होना आवश्यक है। ऐसा ब्रह्मनिष्ठ आचार्य जो योग्य शिष्यों को यथार्थ ज्ञान प्रदान करता है? वह? निसन्देह? मुझे प्राप्त होता है।एक सुशिक्षित पुरुष अपनी कृतज्ञता की भावना के कारण स्वयं को ज्ञान की देवी का ऋणी अनुभव करता है। वस्तुत? हमारी संस्कृति में इसे ऋषि ऋण कहा गया है। इस ऋण से मुक्त होने के लिए हमें ऋषियों के उपदेश का अध्ययन तदनुसार आचरण एवं ग्रहण किये ज्ञान का अध्यापन करना चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है।दर्शन ही प्रत्येक संस्कृति का अधिष्ठान होता है। हिन्दू संस्कृति का पुनरुत्थान एवं गौरवमय पुनर्प्रतिष्ठान तभी संभव होगा? जब उपनिषदों से प्रतिपादित तत्त्वज्ञान के द्वारा वह पोषित की जायेगी। हमारी संस्कृति के जनक? महान् ऋषिगण इस रहस्य को जानते थे। इसलिए उन्होंने अपने शिष्यों से इस ज्ञान का प्रचार करने के लिए सदैव आग्रह किया है। केवल इसी माध्यम से सामान्य जनों के हृदय को ज्ञानालोक से आलोकित किया जा सकता है। संस्कृति की उन्नति का भी यही प्रमुख साधन है।यदि कोई विद्यार्थी इस ज्ञान और संस्कृति का अल्पांश भी समझता है? परन्तु उसका प्रसार करने का प्रयत्न नहीं करता है? तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसमें न बुद्धि की गतिशीलता है और न प्रेरणा की तरलता। परन्तु जो पुरुष गीता के सिद्धांतों का उपदेश देने में समर्थ है? उसका यहाँ अभिनन्दन करते हैं और उसे सर्वोच्च पुरस्कार का आश्वासन देते है कि वह? निसन्देह? मुझे प्राप्त होगा।

English Translation By Swami Sivananda

He who with supreme devotion to Me will teach this supreme secret to My devotees, shall doubtlessly come to Me.

Transliteration

ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣvabhidhāsyati
bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā māmevaiṣyatyasaṃśayaḥ

अनुवाद

जो इस परम रहस्यमय उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझमें परम भक्ति करके निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता के ज्ञान के प्रचार-प्रसार की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। जो व्यक्ति इस परम गोपनीय ज्ञान को भगवान के भक्तों के बीच श्रद्धापूर्वक साझा करता है, वह भगवान की सर्वोच्च भक्ति प्राप्त करता है। अंततः, ऐसा निष्काम प्रचारक बिना किसी संशय के भगवान के परम धाम को प्राप्त होता है।

Translation

He who teaches this supreme secret among My devotees, having performed supreme devotion to Me, shall doubtless come to Me alone.

Meaning

In this verse, Lord Krishna declares the supreme merit of sharing and teaching the knowledge of the Bhagavad Gita. Anyone who explains this confidential and sacred dialogue to His devotees is considered to be performing the highest form of devotional service. Consequently, such a person will undoubtedly attain union with the Supreme Lord.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
इमम्इस
परमम्परम
गुह्यम्गोपनीय रहस्य को
मद्भक्तेषुमेरे भक्तों में
अभिधास्यतिउपदेश करेगा
भक्तिम्भक्ति को
मयिमेरे प्रति
पराम्परम
कृत्वाकरके
माम्मुझको
एवही
एष्यतिप्राप्त होगा
असंशयःनिःसंदेह

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
imamthis
paramamsupreme
guhyamsecret
mad-bhakteṣuamong My devotees
abhidhāsyatiwill teach
bhaktimdevotion
mayiunto Me
parāmsupreme
kṛtvāhaving performed
māmMe
evaalone
eṣyatiwill attain
asaṃśayaḥwithout doubt