Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.63
मूल श्लोक :
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरुHindi Translation By Swami Ramsukhdas
यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है? वैसा कर।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रस्तुत श्लोक कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर दिये गये गीताप्रवचन का अन्तिम श्लोक माना जा सकता है। संस्कृत में इति शब्द के साथ किसी कथन अथवा उद्धरण की समाप्ति की जाती है। इस दृष्टि से भगवान् श्रीकृष्ण अपने उपदेश को यहीं पर सम्पूर्ण करते हैं।गुह्यात् गुह्य तरम् गुह्य या रहस्य उसे कहते हैं? जो अधिकांश लोगों को अज्ञात होता है? किन्तु कुछ विरले लोग उसे जानते हैं। यद्यपि वह अज्ञात होता है? तथपि अज्ञेय नहीं। उसका ज्ञान आप्त पुरुषों (जानकर लोगों) से प्राप्त किया जा सकता है। गीता में आत्मज्ञान का उपदेश दिया गया है। आत्मा द्रष्टा है इसलिए वह कभी इन्द्रिय? मन और बुद्धि द्वारा दृश्यरूप में नहीं जाना जा सकता। इसलिए? कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो? वह स्वयं अपनी बुद्धि के द्वारा आत्मा के शुद्ध स्वरूप का आभास तक नहीं पा सकता। इसके लिए गुरु के उपदेश की नितान्त आवश्यकता होती है। सर्वथा इन्द्रिय अगोचर होने के कारण ही यह आत्मज्ञान समस्त लौकिक रहस्यों से भी अधिक गूढ़ है।गुह्य शब्द का अर्थ यह नहीं होता कि इस ज्ञान का उपदेश किसी को देना ही नहीं चाहिए। परन्तु भारत के पतन काल में कतिपय लोगों ने इसे अपनी वैयक्तिक सम्पत्ति समझकर गुह्य शब्द की आड़ में अन्य लोगों को इस ज्ञान से वंचित रखा। परन्तु यदि हम अपने धर्मशास्त्रों का समुचित अध्ययन करें? तो यह ज्ञात होगा कि उदार हृदय के ऋषियों ने किसी भी स्थान पर ऐसे रूढ़िवादी लोगों के मत का अनुमोदन नहीं किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस पुरुष में सूक्ष्म ज्ञान को ग्रहण करने की मानसिक और बौद्धिक क्षमता नहीं होती? वह इसका अधिकारी नहीं होता। अनधिकारी को सर्वोच्च ज्ञान देने पर वह उसे विपरीत समझकर तथा दोषपूर्ण जीवन जीकर स्वयं की ही हानि कर सकता है।इस पर पूर्ण विचार करके केवल श्रवण या पठन से ही मनुष्य को पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। ज्ञान सन्देह रहित तथा विपर्यय (मिथ्या धारणाओं) से रहित होना चाहिए। इसलिए? आचार्य से प्राप्त किये गये ज्ञान पर युक्तियुक्त मनन और चिन्तन करने की आवश्यकता होती है। प्रत्येक साधक को स्वयं ही मनन करके प्राप्त ज्ञान की सत्यता का निश्चय करना होता है। भगवान् श्रीकृष्ण नहीं चाहते कि अर्जुन उनके उपदेश को विचार किये बिना ही स्वीकार कर ले। इसलिए? यहाँ वे कहते हैं? इस पर पूर्ण विचार करके? जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा तुम करो।यथेच्छसि तथा कुरु भगवान् श्रीकृष्ण? कर्मयोग की जीवनपद्धति को स्वीकार करने के विषय में अन्तिम निर्णय अर्जुन पर ही छोड़ देते हैं। प्रत्येक पुरुष को स्वेच्छा से ही ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इसमें किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी नवीन जन्मों में सहजता या स्वत प्रवृत्ति अमूल्य गुण माना जाता है। जीवन के समस्त सिद्धांतों? तथ्यों एवं उपायों को अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत करने के पश्चात्? भगवान् श्रीकृष्ण उसे विचारपूर्वक निर्णय लेने के लिए आमन्त्रित करते हैं। अध्यात्म के आचार्यों को चाहिए कि वे किसी प्रकार भी अपने शिष्यों को बाध्य न करें। भारतवर्ष में इस प्रकार बाध्य करके कभी धर्म प्रचार नहीं किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Thus has wisdom, more secret than secrecy itself, been declared unto thee by Me; having reflected over it fully, then act as thou wishest.
Transliteration
iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā
vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuruअनुवाद
इस प्रकार मैंने तुम्हें गोपनीय से भी अत्यंत गोपनीय ज्ञान कह दिया है इस पर पूर्ण रूप से विचार करके, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा ही करो
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं। उन्होंने अर्जुन को परम गोपनीय ज्ञान प्रदान कर दिया है, और अब वे चाहते हैं कि अर्जुन इस ज्ञान पर गहराई से विचार करे। इसके बाद अर्जुन अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार स्वयं निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
Translation
Thus, the knowledge that is more secret than all secrets has been declared to you by Me Reflecting on this fully, do as you wish
Meaning
In this verse, Lord Krishna grants complete freedom of choice to Arjuna. Having imparted the most confidential and profound knowledge, Krishna encourages Arjuna to deliberate on it thoroughly. Ultimately, Arjuna is left to make his own decision based on his understanding and free will.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इति | इस प्रकार |
| ते | तुम्हारे लिए |
| ज्ञानम् | ज्ञान |
| आख्यातम् | कहा गया है |
| गुह्यात् | गोपनीय से |
| गुह्यतरम् | अधिक गोपनीय |
| मया | मेरे द्वारा |
| विमृश्य | विचार करके |
| एतत् | इस पर |
| अशेषेण | पूर्ण रूप से |
| यथा | जैसे |
| इच्छसि | तुम चाहते हो |
| तथा | वैसे ही |
| कुरु | करो |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| iti | thus |
| te | to you |
| jñānam | knowledge |
| ākhyātam | has been declared |
| guhyāt | than the secret |
| guhyataram | more secret |
| mayā | by Me |
| vimṛśya | reflecting |
| etat | on this |
| aśeṣeṇa | fully / without omission |
| yathā | as |
| icchasi | you wish |
| tathā | so |
| kuru | do |