श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.62

मूल श्लोक :

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति(संसारसे सर्वथा उपरति) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मन्त्र का भावार्थ यह है कि यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए? नामरूपों के भेद से दृष्टि हटाकर अनन्त परमात्मा का आनन्दानुभव करो किसी के धन का लोभ मत करो। गीतादर्शन का सारतत्त्व भी यही है। अहंकार का त्याग करके अपने कर्त्तव्य करो यह तो मानो गीता का मूल मंत्र ही है। आत्मा और अनात्मा के मिथ्या सम्बन्ध से ही कर्तृत्वाभिमानी जीव की उत्पत्ति होती है। यह जीव ही संसार के दुखों को भोगता रहता है। अत? इससे अपनी मुक्ति के लिए अहंकार का परित्याग करना चाहिए। यहाँ प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि अहंकार का त्याग कैसे करें  इसके उत्तर में ईश्वरार्पण की भावना का वर्णन किया गया है। पूर्वश्लोक में ही ईश्वर के स्वरूप को दर्शाया गया है। इसलिए? अब? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं? तुम उसी हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाओ।शरण में जाने का अर्थ है अभिमान एवं फलासक्ति का त्याग करके? कर्माध्यक्षकर्मफलदाता ईश्वर का सतत स्मरण करते हुए कर्म करना। इसके फलस्वरूप चित्त की शुद्धि प्राप्त होगी? जो आत्मज्ञान में सहायक होगी। आत्मज्ञान की दृष्टि से शरण का अर्थ होगा  समस्त अनात्म उपाधियों के तादात्म्य को त्यागकर आत्मस्वरूप ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव करना। यह शरणागति अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ ही हो सकती है (सर्वभावेन)? अधूरे हृदय से नहीं। राधा? हनुमान और प्रह्लाद जैसे भक्त इसके उदाहरण हैं।चित्त की शुद्धि और आत्मानुभूति ही ईश्वर की कृपा अथवा प्रसाद है। जिस मात्रा में? अनात्मा के साथ हमारा तादात्म्य निवृत्त होगा? उसी मात्रा में हमें ईश्वर का यह प्रसाद प्राप्त होगा।भारत  भरतवंश में जन्म लेने के कारण अर्जुन का नाम भारत था। शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ है वह पुरुष जो भा अर्थात् प्रकाश (ज्ञान) में रत है। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश में रमने वाले ऋषियों के कारण ही यह देश भारत कहा गया है।प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Fly unto Him for refuge with all thy being, O Arjuna; by His grace thou shalt obtain supreme peace (and) the eternal abode.

Transliteration

tam eva śaraṇaṃ gaccha sarva-bhāvena bhārata
tat-prasādāt parāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam

अनुवाद

हे भारत (अर्जुन)! तुम सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम परम शान्ति को और सनातन परम धाम को प्राप्त करोगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सर्वभावेन अर्थात् मन, वचन और कर्म से ईश्वर की शरण में जाने का उपदेश देते हैं। पूर्ण शरणागति से ही मनुष्य को परम शान्ति और शाश्वत भगवद्धाम की प्राप्ति होती है। यह गीता के परम गोपनीय उपदेशों का सार है जहाँ अहंकार को त्यागकर पूर्ण समर्पण की बात कही गई है।

Translation

Surrender unto Him utterly, O Bharata (Arjuna), with your whole being. By His grace you shall attain supreme peace and the eternal abode.

Meaning

In this verse, Lord Krishna instructs Arjuna to surrender completely to the Supreme Lord with all his heart, mind, and soul. Through absolute surrender, one transcends material miseries and attains supreme peace and the eternal, imperishable spiritual abode. This represents the pinnacle of devotion and the ultimate path to liberation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तम्उस (परमेश्वर) की
एवही
शरणम्शरण में
गच्छजाओ
सर्व-भावेनसब प्रकार से (अपने सम्पूर्ण भाव से)
भारतहे भरतवंशी अर्जुन
तत्-प्रसादात्उनकी कृपा से
पराम्परम
शान्तिम्शान्ति को
स्थानम्धाम को
प्राप्स्यसितुम प्राप्त करोगे
शाश्वतम्सनातन (नित्य)

Word by word

WordMeaning
tamunto Him
evaonly
śaraṇamsurrender
gacchago
sarva-bhāvenawith your whole being (in all respects)
bhārataO descendant of Bharata (Arjuna)
tat-prasādātby His grace
parāmsupreme
śāntimpeace
sthānamabode
prāpsyasiyou will attain
śāśvatameternal