Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.61
मूल श्लोक :
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि माययाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे अर्जुन ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश सुस्पष्ट एवं सर्वथा सन्देह रहित है। गीताचार्य कहते हैं? मेरा स्मरण ईश्वर अर्थात् सम्पूर्ण विश्व के शासक के रूप में करो। ईश्वर ही नियामक और नियन्ता है। उसकी उपस्थिति में ही जगत् की समस्त घटनाएं घट सकती हैं? अन्यथा नहीं। जैसै कि वाष्प इंजन का ईश्वर वाष्प है? जिसके बिना इंजन में गति नहीं आ सकती।ईश्वर का स्मरण केवल सगुणसाकार अर्थात् शक्ति के मानवीय रूप में ही नहीं करना चाहिये? जैसे कैलाशपति? शिवजी? या वैकुण्ठवासी विष्णु या स्वर्ग में स्थित पिता के रूप में। ईश्वर तो भूतमात्र के हृदय में निवास कर रहा अंतरयामी है। इसकी पहचान हृदय में ही हो सकती है। जिस प्रकार विशाल महानगरी में किसी व्यक्ति से मिलने के लिये उसके निवासस्थान का पता बताया जाता है? उसी प्रकार? यहाँ? भगवान् श्रीकृष्ण अपना स्थानीय पता बता रहे हैंहृदय शब्द से तात्पर्य शारीरिक अंग रूप हृदय से नहीं है। दर्शनशास्त्र में हृदय का अर्थ लाक्षणिक है? शाब्दिक नहीं। प्रेम? करुणा? धृति? उत्साह? स्नेह? कोमलता? क्षमा? उदारता जैसे दैवी गुणों से सम्पन्न मन ही हृदय कहलाता है। परमेश्वर ही चेतनता और शक्ति का स्रोत है? जो अपनी शक्ति प्राणीमात्र को प्रदान करता है। समस्त प्राणी ईश्वर के ही चारों ओर इस प्रकार घूमते रहते हैं? जैसे कठपुतलियां किसी के हाथों में बन्धी खेल करती है। कठपुतलियों की अपनी कोई सार्मथ्य? शक्ति या भावना नहीं होती? वे जो कुछ खेल करती दिखाई देती हैं? वह सब अदृश्य हाथ की शक्ति है जो उन कठपुतलियों को धारण किये रहता है।पारमर्थिक दृष्टि से? ईश्वर का अर्थ चैतन्यस्वरूप ब्रह्म है। इस चैतन्य के सम्बन्ध से ही शरीर? मन आदि जड़ उपाधियाँ कार्य करने में सक्षम होती हैं। अन्यथा? जड़ पदार्थ में स्वयं न कर्म करने की शक्ति है और न वस्तुओं को जानने की। इस दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ यह होगा कि चैतन्यस्वरूप आत्मा की उपस्थिति में प्राणीमात्र अपनेअपने स्वभाव के अनुसार यत्रतत्र भ्रमण करते रहते हैं। इसी तथ्य को यहाँ इस प्रकार कहा गया है कि ईश्वर अपनी माया से भूतमात्र को घुमाता है।इसी श्लोक का दूसरा अर्थ निम्न प्रकार से होगा। समष्टि माया में व्यक्त चैतन्यस्वरूप परमात्मा ही ईश्वर कहलाता है? जो सर्वज्ञसर्वशक्तिमान् है। वह ईश्वर अपनी माया से समस्त जीवों को घुमाता है इसका अर्थ यह हुआ कि वह ईश्वर समस्त जीवों को उनके कर्मानुसार फल प्रदान करता है। ईश्वर के बिना व्यष्टि जीवों का अस्तित्व संभव ही नहीं है। समस्त जीवों को कर्म और ज्ञान की शक्तियां ईश्वर से ही प्राप्त होती हैं। इस प्रकार? वेदान्त के सिद्धांत को समझकर इस श्लोक के अध्ययन से यहाँ प्रयुक्त रूपक का अर्थ स्पष्ट हो जाता है।
English Translation By Swami Sivananda
The Lord dwells in the hearts of all beings, O Arjuna, causing all beings, by His illusive power, to revolve as if mounted on a machine.
Transliteration
īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ hṛddeśe'rjuna tiṣṭhati
bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayāअनुवाद
हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय-देश में स्थित है और अपनी माया से, यन्त्र पर चढ़े हुए के समान, सब प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं। वे अपनी दिव्य माया शक्ति से सभी जीवों को उनके कर्मों के अनुसार संसार रूपी चक्र में घुमाते हैं, जैसे कोई कठपुतली या यंत्र पर आरूढ़ व्यक्ति घूमता है। इसलिए मनुष्य को अपने अहंकार को त्यागकर उस परमेश्वर की शरण में जाना चाहिए।
Translation
The Supreme Lord dwells in the heart of all beings, O Arjuna causing all beings to spin, as if mounted on a machine, by His illusory power
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that the Supreme Lord resides within the heart of every living being. Using His material energy (maya), He directs the wanderings of all living entities, who are seated as on a machine made of material energy. This emphasizes the supreme control of God and the need for surrender, moving away from individual ego.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ईश्वरः | परमेश्वर |
| सर्व-भूतानाम् | सभी प्राणियों के |
| हृद्-देशे | हृदय रूपी स्थान में |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| तिष्ठति | स्थित है |
| भ्रामयन् | भ्रमण कराते हुए |
| सर्व-भूतानि | सभी प्राणियों को |
| यन्त्र-आरूढानि | यन्त्र पर चढ़े हुओं को |
| मायया | अपनी माया शक्ति से |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| īśvaraḥ | the Supreme Lord |
| sarva-bhūtānām | of all living beings |
| hṛd-deśe | in the region of the heart |
| arjuna | O Arjuna |
| tiṣṭhati | resides |
| bhrāmayan | causing to travel / spin |
| sarva-bhūtāni | all living beings |
| yantra-ārūḍhāni | mounted on a machine |
| māyayā | by His illusory power |