Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.60
मूल श्लोक :
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे कुन्तीनन्दन अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता? उसको तू (क्षात्रप्रकृतिके) परवश होकर करेगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण का? सारांश में? कथन यह है मैं तुम्हें इसलिये युद्ध में प्रवृत्त नहीं कर रहा हूँ कि मुझे तुमसे सहानुभूति नहीं है? वरन् इसलिये कि इसके अतिरिक्त तुम्हारे लिए अन्य कोई मार्ग ही नहीं रहा है। तुम्हारे लिये कोई विकल्प ही नहीं है। यद्यपि तुम दुराग्रह कर रहे हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे? किन्तु यह तुम्हारा केवल मोह और भ्रम ही है। तुम्हें युद्ध करना ही पड़ेगा? क्योंकि तुम्हारा स्वभाव अपना प्रभाव अवश्य दिखायेगा। इस प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण ने बारम्बार कहा है? तुम मेरा सतत् स्मरण करो। इसका अर्थ क्या है किस प्रकार हम ईश्वर का स्मरण करें क्या इसका अर्थ ईश्वर का ध्यान करना है हमारा परमेश्वर के साथ क्या संबंध होना चाहिये क्या हम उन्हें कोई ऐतिहासिक पुरुष मानें? अथवा सदैव हमारे हृदय में वास करने वाले आत्मतत्त्व के रूप में उन्हें जाने एक लगनशील विद्यार्थी के मन में उठने वाले प्रश्नों के उत्तर अगले श्लोक में दिये गये हैं
English Translation By Swami Sivananda
O Arjuna, bound by thy own Karma (action) born of thy own nature, that which from delusion thou wishest not to do, even that thou shalt do helplessly.
Transliteration
svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā
kartuṃ necchasi yanmohāt kariṣyasyavaśo'pi tatअनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बंधे हुए तुम, मोह के कारण जिस कर्म को करना नहीं चाहते हो, उसे भी परवश होकर करोगे।
भावार्थ
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने जन्मजात स्वभाव और संस्कारों से बंधा होता है। अर्जुन का क्षत्रिय स्वभाव उसे युद्ध से भागने नहीं देगा। यदि वह मोहवश इस समय युद्ध न करने का निर्णय भी लेता है, तो भी उसका अंतर्निहित स्वभाव उसे अंततः युद्ध करने के लिए विवश कर देगा।
Translation
O son of Kunti, bound by your own duty born of your nature, that which you do not wish to do out of delusion, you will do even against your will, being helpless.
Meaning
Lord Krishna explains to Arjuna that every individual is bound by the tendencies born of their own nature (svabhava). Arjuna’s inherent Kshatriya (warrior) nature will not allow him to remain inactive. Even if he decides not to fight now due to delusion, his own nature will eventually compel him to act and fight.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| स्वभावजेन | अपने स्वभाव से उत्पन्न |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन) |
| निबद्धः | बंधा हुआ |
| स्वेन | अपने |
| कर्मणा | कर्म द्वारा |
| कर्तुम् | करने के लिए |
| न | नहीं |
| इच्छसि | चाहते हो |
| यत् | जिसको |
| मोहात् | मोह के कारण |
| करिष्यसि | करोगे |
| अवशः | विवश होकर / परवश होकर |
| अपि | भी |
| तत् | उसको |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| svabhāvajena | born of your own nature |
| kaunteya | O son of Kunti |
| nibaddhaḥ | bound |
| svena | by your own |
| karmaṇā | by action / duty |
| kartum | to do |
| na | not |
| icchasi | you wish |
| yat | which |
| mohāt | out of delusion |
| kariṣyasi | you will do |
| avaśaḥ | helplessly / against your will |
| api | even |
| tat | that |