श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.6

मूल श्लोक :

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पार्थ (पूर्वोक्त यज्ञ? दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इन यज्ञ? दान और तपरूप कर्मों का भी पालन करना चाहिए। सम्पूर्ण गीता में संग अर्थात् आसक्ति शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर हुआ है? जिसका अपना एक विशेष अर्थ है। यह शब्द? कर्तृत्वाभिमानी जीव का अपने कर्मफल के साथ संबंध बताने वाला है। उदाहरणार्थ? नव विवाहित दम्पत्ति को पुत्र की इच्छा होती है। यह सामान्य इच्छा है। परन्तु? यदि वे कहें? हमें पुत्र ही चाहिए? पुत्री नहीं? तो उनका यह आग्रह संग या आसक्ति है। ऐसा आग्रह रखना अविवेक का ही लक्षण है।आसक्ति से अभिभूत पुरुष अपने इष्टफल को प्राप्त करने में अविवेकपूर्ण या आत्मघातक चिन्ताओं से ग्रस्त हो जाता है। फल प्राप्ति के पूर्व ही उसके विषय में चिन्ता और व्याकुलता होने से मनुष्य की कार्यकुशलता समाप्तप्राय हो जाती है। इसलिए भगवान् का उपदेश है कि यज्ञादिक कर्म भी फलासक्ति के बिना करने चाहिए। यह भगवान् श्रीकृष्ण का अपना मत है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि उनका यह सर्वथा मौलिक मत है। वेदों में भी निष्काम कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है।कर्मयोग के जीवन को अपनाने से अन्तकरण की शुद्धि के द्वारा मनुष्य अपने नित्य शुद्धबुद्ध मुक्त स्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को स्नेहपूर्वक पार्थ कहकर सम्बोधित करते हैं? जो निकट का संबंध बताने वाला नाम है। भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन इसी जीवन पद्धति का,अवलम्बन करे।यज्ञादि कर्मों की कर्तव्यता को दर्शाने के पश्चात्? भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

But even these actions should be performed leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is My certain and best conviction.

Transliteration

etāny api tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca
kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matam uttamam

अनुवाद

हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके कर्तव्य समझकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है

भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे पावन कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें केवल कर्तव्य मानकर, बिना किसी फल की इच्छा या कर्तापन के अहंकार के किया जाना चाहिए। यही निष्काम कर्मयोग का वास्तविक सिद्धांत है और भगवान का परम मत है।

Translation

O Partha, even these actions must be performed leaving aside attachment and the fruits; this is My definite and highest belief

Meaning

Lord Krishna clarifies that essential duties like sacrifice, charity, and penance should never be abandoned. They must be performed purely as a matter of duty, without any personal attachment or desire for their fruits. This is the core principle of Nishkama Karma Yoga and represents the Lord’s supreme judgment.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
एतानिइन
अपिभी
तुतो
कर्माणिकर्मों को
सङ्गम्आसक्ति को
त्यक्त्वात्यागकर
फलानिफलों को
चऔर
कर्तव्यानिकरने योग्य हैं
इतिइस प्रकार
मेमेरा
पार्थहे अर्जुन (प्रथापुत्र)
निश्चितम्निश्चित किया हुआ
मतम्मत
उत्तमम्सर्वश्रेष्ठ

Word by word

WordMeaning
etānithese
apieven
tuindeed
karmāṇiactions
saṅgamattachment
tyaktvāhaving given up
phalānifruits
caand
kartavyānimust be performed
itithus
meMy
pārthaO Partha (Arjuna)
niścitamdefinite
matamopinion
uttamamhighest