Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.58
मूल श्लोक :
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सारांशत? साधक को सतत ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य कर्म करते रहने चाहिए। सतत अभ्यास करने पर शरीर और मन भी ऐसी अनुप्राणित बुद्धि का साथ देने लगते हैं? जो ईश्वर के अखण्ड स्मरण में रमती है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं? मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों को पार कर जाओगे। हमारे जीवन में आने वाले अधिकांश विघ्न या प्रतिबन्ध केवल काल्पनिक होते हैं। मिथ्या भय और वृथा चिन्ता संभ्रमित मन के लक्षण हैं। मन के परमात्मस्वरूप में समाहित होने से प्राप्त होने वाले फल को ही कृपा कहते हैं। यहाँ कथित कृपा का अर्थ यह नहीं है कि करुणासागर भगवान् भक्त विशेष पर ही अपनी कृपा की वर्षा करते हैं? और अन्य जनों पर नहीं। भगवान् तो स्वयं कृपास्वरूप ही हैं। उनकी कृपा सर्वव्यापी है। आवश्यकता केवल हमारे अन्तकरण को शुद्ध करने की तथा विवेक को जाग्रत करने की है। शुद्धता और विवेक होने पर परमात्मा शुद्ध स्वरूप में प्रकट हो जाता है? जो साधक के हृदय में पहले से ही विद्यमान था। सूर्य का प्रकाश किसी से पक्षपात नहीं करता। परन्तु जो व्यक्ति अपने घर के द्वार और वातायन सदैव बन्द रखता है? वह सूर्य प्रकाश से वंचित रह जाता है। इसमें सूर्य को दोष नहीं दिया जा सकता।इस श्लोक की द्वितीय पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि अहंकारवश उनके उपदेश का पालन न करने पर मनुष्य अपना नाश ही कर लेगा। प्राकृतिक नियम अपरिवर्तनीय होते हैं उनके न नेत्र होते हैं न श्रोत्र। वे अपना काम लयबद्ध करते रहते हैं। जो मनुष्य इन नियमें को पहचान कर उनका पूर्ण पालन करता है? वही सुखी रहता है।यदि अहंकारवश तुम नहीं सुनोगे? तो तुम नष्ट हो जाओगे यह किसी क्रूर सत्ताधारी की मानव जाति को भयभीत करके उससे आज्ञा पालन करवाने के लिए दी गई धमकी नहीं है।अन्य धर्मों में दी गई नरक की धमकी के साथ इसकी तुलना नहीं करनी चाहिए। यह वस्तु स्थिति का कथन मात्र है। यदि न्यूटन भी अपने घर की छत से कूद पड़ता तो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति निःक्ष्ड़ त्द्धड़श्चत रूप से उस पर भी अपना प्रभाव दिखाती ही प्रकृति के नियमों में एक निश्चितता है। बन्धन और मोक्ष? इन दो विकल्पों में से मनुष्य किसी का भी चयन करने में स्वतन्त्र है। मोक्षमार्ग का यहाँ वर्णन किया जा चुका है। प्रस्तुत कथन में भगवान् की केवल निर्मम स्पष्टवक्तृता तथा साधक के कल्याण की भावना ही स्पष्ट होती है। अपने इस स्पष्ट कथन से वे किसी बात को बनाना या बिगाड़ना नहीं चाहते।अन्तप्रेरणा की सौम्य एवं मधुर वाणी से हमें सदैव जीवन की सत्य पद्धति का मार्गदर्शन मिलता रहता है। परन्तु मनुष्य का अहंकार और स्वार्थ उस मधुर वाणी की उपेक्षा करके विषयोपभोग के निम्नस्तरीय जीवन का ही अनुकरण करता है। फलत वह अपने ही अनियन्त्रित मनोवेगों तथा अशुद्ध विचारों द्वारा दण्डित किया जाता है। अत यहाँ चेतावनी दी गई है कि तुम नष्ट हो जाओगे। यहाँ नाश का यह अर्थ है कि ऐसा अहंकारी पुरुष जीवन के परम पुरुषार्थ को नहीं प्राप्त कर सकता।अपने कथन को और अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Fixing thy mind on Me, thou shalt by My grace overcome all obstacles; but if from egoism thou wilt not hear Me, thou shalt perish.
Transliteration
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi
atha cettvamahaṅkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasiअनुवाद
मुझमें चित्त लगाने वाले होकर तुम मेरी कृपा से सभी संकटों को पार कर जाओगे और यदि तुम अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि यदि वह अपना मन परमात्मा में केंद्रित रखेगा, तो वह जीवन के सभी संकटों और युद्ध की कठिनाइयों को पार कर जाएगा। इसके विपरीत, यदि वह अहंकारवश भगवान के उपदेशों की उपेक्षा करेगा, तो उसका आध्यात्मिक और नैतिक पतन निश्चित है। यह श्लोक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और अहंकार के त्याग के महत्व को दर्शाता है।
Translation
Fixing your mind on Me, you will overcome all obstacles by My grace But if, due to egoism, you do not listen to Me, you will perish
Meaning
Lord Krishna assures Arjuna that by keeping his mind focused on the Divine, he will cross over all difficulties and obstacles through divine grace. Conversely, if Arjuna allows his ego to dictate his actions and ignores the divine counsel, he will face spiritual ruin. This verse emphasizes the necessity of surrendering the ego and trusting in divine guidance.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मच्चित्तः | मुझमें चित्त लगाने वाला |
| सर्व | सभी |
| दुर्गाणि | संकटों को |
| मत्-प्रसादात् | मेरी कृपा से |
| तरिष्यसि | तुम पार कर जाओगे |
| अथ | और |
| चेत् | यदि |
| त्वम् | तुम |
| अहङ्कारात् | अहंकार के कारण |
| न | नहीं |
| श्रोष्यसि | सुनोगे |
| विनङ्क्ष्यसि | नष्ट हो जाओगे |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| maccittaḥ | with mind fixed on Me |
| sarva | all |
| durgāṇi | obstacles / difficulties |
| mat-prasādāt | by My grace |
| tariṣyasi | you will overcome |
| atha | but |
| cet | if |
| tvam | you |
| ahaṅkārāt | from egoism |
| na | not |
| śroṣyasi | will listen |
| vinaṅkṣyasi | you will perish |