Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.56
मूल श्लोक :
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
गीता का तत्त्वज्ञान अत्यन्त जीवन्त और शक्तिशाली है। सरल और सामान्य प्रतीत होने वाला? भगवान् का यह दिव्य गान मानो शक्ति के किसी विस्फोटक पदार्थ का भंडार है जिसे सम्यक् ज्ञान द्वारा विस्फोटित किया जा सकता है।इसके उपदेशानुसार जीवन जीने की उष्णता पाकर वह भण्डार फूट पड़ता है। उसके विस्फोट से एक साधक के श्रेष्ठ एवं दिव्य व्यक्तित्व की संभावनाओं पर जमी हुई अज्ञान की वे समस्त पर्तें ध्वस्त हो जाती हैं। गीता के अनुसार? केवल निष्क्रिय समर्पण अथवा कर्मकाण्ड का अनुष्ठान ही भक्ति नहीं है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व के अभिमान का परित्याग कर परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करना भक्ति है। भगवान् श्रीकृष्ण इस बात पर भी विशेष बल देते हैं कि साधक को अपने ज्ञान एवं अनुभव को व्यावहारिक जीवन में भी जीने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए।भगवान् श्रीकृष्ण के मतानुसार धर्म की पूर्णता विषयों से केवल विरति और निजानुभूति में ही नहीं हैं। उनका यह निश्चित मत है कि ज्ञानी पुरुष को आत्मानुभव के पश्चात् पुन व्यावहारिक जगत् में आकर कर्म करने चाहिए। परन्तु ये कर्म निजानुभव की शान्ति और आनन्द से सुरभित हों? जिससे कि यह मन्द और म्लान जगत् तेजोमय और कान्तिमय बन जाये। इसलिए? परम भक्त बनने के लिए एक और आवश्यक गुण का वर्णन इस श्लोक में किया गया है।निस्वार्थ समाज सेवा के अधिकार पत्र के बिना? गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण न तो किसी भक्त का स्वागत करना चाहते हैं और न किसी को अपना दर्शन देना चाहते हैं। उनकी यह स्पष्ट घोषणा है? जो पुरुष मदाश्रित होकर समस्त कर्म करता है? वह मेरे प्रसाद से अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।ईश्वरार्पण की भावना से ही कर्तृत्वाभिमान को त्यागा जा सकता है। इस भावना से कर्तव्य पालन करने वाले साधक को ईश्वर का प्रसाद? अर्थात् अनुग्रह (कृपा) प्राप्त होता है।अपनी कृपा से भिन्न ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है? ईश्वर ही स्वयं अपनी कृपा है और उसकी कृपा ही वह स्वयं है। अत कृपाप्राप्ति का अभिप्राय यह है कि जिस मात्रा में साधक का अन्तकरण शान्त? शुद्ध? स्थिर और सुगठित होगा? उसी मात्रा में उसे परमात्मनुभूति स्पष्ट होगी। परमात्मा नित्य (शाश्वत) और अविकारी (अव्यय) है। इसलिए? भगवान् कहते हैं कि उत्तम साधक उनकी कृपा से शाश्वत? अव्यय पद को प्राप्त होता है।प्रस्तुत प्रकरण में? भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान? भक्ति एवं कर्म मार्गों को इंगित किया है। इन सबका लक्ष्य एक ही है साधक का साध्य के साथ एकत्व का अनुभव। सम्पूर्ण साधना गीतोपदेश का सार है। कर्म? भक्ति और ज्ञान की संयुक्त रूप में साधना करने से हमारे व्यक्तित्व के शारीरिक? मानसिक एवं बौद्धिक इन तीनों पक्षों में सामञ्जस्य आ जाता है। कर्मयोग? भक्तियोग एवं ज्ञानयोग का क्रमश शरीर? मन और बुद्धि के स्तर पर पालन करने के लिए गीता में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार? द्रष्टामन्ताज्ञाता रूप जीव को अपने आत्मस्वरूप में पूर्ण स्थिति सिद्ध कराने में गीतोपदेश का प्रमुख योगदान है। हिन्दुओं की औपनिषदिक संस्कृति के पुनरुत्थान में गीता का महत्वपूर्ण स्थान है।इस प्रकार? ब्रह्मप्राप्ति की साधना का क्रमबद्धविवेचन करने के पश्चात्? उपदेश देते हैं कि
English Translation By Swami Sivananda
Doing all actions always having taken refuge in Me, by My grace he obtains the eternal indestructible state of being.
Transliteration
sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ
matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayamअनुवाद
मुझ पर पूर्णतः आश्रित रहने वाला मनुष्य सदा सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त कर लेता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। जो भक्त अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित कर देता है और केवल उन्हीं की शरण में रहता है, वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। भगवान की अहैतुकी कृपा से ऐसा साधक परम धाम को प्राप्त करता है, जो कभी नष्ट नहीं होता।
Translation
Though performing all kinds of actions at all times, one who has taken full refuge in Me attains, by My grace, the eternal and imperishable state
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes the power of absolute surrender and devotion. A devotee who performs all duties while being completely surrendered to the Supreme Lord is not bound by the reactions of those actions. By the Lord’s divine grace, such a person attains the eternal, imperishable spiritual realm.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सर्व | सब प्रकार के |
| कर्माणि | कर्मों को |
| अपि | भी |
| सदा | सदा |
| कुर्वाणः | करता हुआ |
| मत्-व्यपाश्रयः | मेरे आश्रित रहने वाला |
| मत्-प्रसादात् | मेरी कृपा से |
| अवाप्नोति | प्राप्त करता है |
| शाश्वतम् | सनातन |
| पदम् | पद को |
| अव्ययम् | अविनाशी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sarva | all |
| karmāṇi | activities |
| api | even |
| sadā | always |
| kurvāṇaḥ | performing |
| mad-vyapāśrayaḥ | one under My protection |
| mat-prasādāt | by My grace |
| avāpnoti | attains |
| śāśvataṃ | the eternal |
| padam | abode |
| avyayam | imperishable |