Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.52
मूल श्लोक :
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त? वैराग्यके आश्रित? एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके? शरीरवाणीमनको वशमें करके? शब्दादि विषयोंका त्याग करके और रागद्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है? वह अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विविक्तसेवी पूर्व श्लोक में वर्णित गुणों से युक्त साधक को एकान्त में जाना चाहिए। एकान्तवासीस्वभाव के साधक को विवक्तसेवी कहते हैं। एकान्त के लिए किसी वनउपवन में ही जाने की आवश्यकता नहीं है। इससे तात्पर्य ऐसे स्थान से है? जहाँ बाह्य विक्षेपों की संख्या न्यूनतम हो। कोई व्यक्ति अपने घर में भी ऐसे समय का चयन कर सकता है? जब वहाँ विक्षेपों के कारण नहीं होते हैं।लघ्वाशी इस शब्द का अर्थ है मिताहारी। अत्यधिक भोजन करने से शरीर स्थूल और बुद्धि मन्द हो जाती है। समस्त साधकों के लिए परिमितता तो एक नियम ही है।यतवाक्कायमानस वाणी और शरीर से तात्पर्य कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से है। इन दोनों के वश में होने पर मन का संयम भी सरल हो जाता है। विषयग्रहण? तत्पश्चात् होने वाली प्रतिक्रियायें तथा मन को संयत करने का अर्थ इन सब कर्मों में अहंकार भाव का त्याग करना है।ध्यानयोगपर मन वृत्तिरूपी है। अत मन कभी निरालम्ब नहीं रह सकता। उसकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति को अवरुद्ध करने का एकमात्र उपाय यह है कि उसे चिन्तन के लिए कोई श्रेष्ठ ध्येय उपलब्ध कराया जाये। जिस मात्रा में वह उस ध्येय में समाहित होता जायेगा? उसी मात्रा में उसकी बहिर्मुखी प्रवृत्ति भी शान्त होती जायेगी। विषयों से निवृत्त करके मन को परमात्मा के स्वरूप में स्थित या समाहित करने का प्रयत्न ही ध्यानयोग कहा जाता है। साधक को इसकी साधना में सदैव तत्पर रहना चाहिए? क्योंकि मन के उपशमन का यही सर्वश्रेष्ठ साधन है।वैराग्य से युक्त वैराग्य राग का विरोधी नहीं है। राग का विरोधी तो द्वेष है। राग और द्वेष इन दोनों से ही मुक्त होना वैराग्य है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि विषयों में सुख नहीं है? तब उसका मन स्वत ही विषयों से विरत हो जाता है। वैराग्यशाली पुरुष विषयों से दूर नहीं भागता? वरन् वे विषय ही ऐसे पुरुष से निराश होकर भाग जाते हैं जैसेजैसे मनुष्य का विकास होता जाता है? वैसेवैसे उसकी अभिरुचियों में भी परिवर्तन आता है और उन परिवर्तनों के साथ ही अपनी पूर्व रुचियों की वस्तुओं में उसका कोई आकर्षण नहीं रह जाता। उदाहरणार्थ? जब तक कोई मनुष्य भोगी और विलासी प्रवृत्ति का होता है? उसका मित्र परिवार भी समान गुणों वाला रहता है। परन्तु जब वह राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में रुचि लेने लगता है? तब उसका घर राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भरा रहने लगता है। कुछ समय बाद विचारों में और अधिक पक्वता आने पर वह पुरुष आध्यात्मिक स्वभाव का बन जाता है। उस स्थिति में सत्तावार्ता में रमने वाले राजनीतिज्ञ और ईर्ष्या तथा प्रतिस्प्ार्धा के भाव से पूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता भी वहाँ से निवृत्त हो जाते हैं। अब उनका स्थान तत्त्वचिन्तक और आध्यात्मिक पुरुष ले लेते हैं। इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार मन के विकसित होने पर निम्न स्तर की वस्तुएं स्वत निवृत्त हो जाती हैं। यह वास्तविक वैराग्य है। इस वैराग्य में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता।
English Translation By Swami Sivananda
Dwelling in solitude, eating but little, with speech, body and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, resorting to dispassion.
Transliteration
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥअनुवाद
एकांत स्थान का सेवन करने वाला, अल्प भोजन करने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला और वैराग्य का भली-भांति आश्रय लेने वाला
भावार्थ
इस श्लोक में ज्ञाननिष्ठा की सिद्धि के लिए आवश्यक साधनों का वर्णन किया गया है। साधक को एकांतप्रिय होना चाहिए और अपनी शारीरिक आवश्यकताओं जैसे भोजन पर नियंत्रण रखना चाहिए। उसे अपने मन, वाणी और शरीर को संयमित रखकर निरंतर ध्यान योग में लीन रहना चाहिए तथा संसार के प्रति वैराग्य भाव को सुदृढ़ करना चाहिए।
Translation
Dwelling in solitude, eating lightly, controlling speech, body, and mind, ever engaged in the yoga of meditation, and taking firm refuge in dispassion
Meaning
This verse describes the essential disciplines required for establishing oneself in the path of knowledge. The seeker is advised to live in solitude, eat moderately, and master control over speech, body, and mind. By constantly practicing meditation and cultivating a deep sense of dispassion toward worldly objects, one prepares the mind for ultimate self-realization.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विविक्त-सेवी | एकांत स्थान का सेवन करने वाला |
| लघु-आशी | अल्प भोजन करने वाला (मितहारी) |
| यत-वाक-काय-मानसः | संयमित वाणी, शरीर और मन वाला |
| ध्यान-योग-परः | ध्यान योग के परायण |
| नित्यम् | निरंतर |
| वैराग्यम् | वैराग्य को |
| समुपाश्रितः | भली-भांति आश्रय लिए हुए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| vivikta-sevī | resorting to solitary places |
| laghu-āśī | eating lightly |
| yata-vāk-kāya-mānasaḥ | controlling speech, body, and mind |
| dhyāna-yoga-paraḥ | absorbed in the yoga of meditation |
| nityam | constantly |
| vairāgyam | dispassion |
| samupāśritaḥ | having taken firm refuge in |