Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.51
मूल श्लोक :
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य चHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त? वैराग्यके आश्रित? एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके? शरीरवाणीमनको वशमें करके? शब्दादि विषयोंका त्याग करके और रागद्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है? वह अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विशुद्ध बुद्धि से युक्त अर्थात् जिसका अन्तकरण शुद्ध है। विषयार्जन और विषयोपभोग की वासनाओं से मुक्त अन्तकरण ही शुद्ध कहलाता है। विशुद्ध बुद्धि से तात्पर्य सात्त्विकी बुद्धि से भी है।ध्यानाभ्यास के समय साधक का आन्तरिक सामञ्जस्य और शान्ति दो कारणों से नष्ट हो सकती है। (1) इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण से? अथवा (2) मन द्वारा पूर्वानुभूत भोगों के स्मरण अर्थात् भोगस्मृति से। साधक को सात्त्विकी धृति से मन को संयमित करना चाहिए अर्थात् ध्यान के समय विषयभोगों का स्मरण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार? शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध इन विषयों को त्यागने का अर्थ यह है कि यदि इन्द्रिय द्वारा कोई विषय ग्रहण किया भी जाता है? तो उसका चिन्तन प्रारम्भ नहीं करना चाहिए। यह तभी संभव होगा? जब साधक अपने व्यक्तिगत रागद्वेषों से मुक्त होगा। इन सबको सम्पादित करने के लिए मन के चारों ओर ज्ञान की प्राचीर (दीवार) निर्म्ात करनी चाहिए। ज्ञान से ही मन को अपने वश में किया जा सकता है। मनसंयम और इन्द्रियसंयम को क्रमश शम और दम भी कहते हैं।ध्यानाभ्यास के साधक के विषय में? और आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Endowed with a pure intellect, controlling the self by firmness, relinishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.
Transliteration
buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyā'tmānaṃ niyamya ca
śabdādīn viṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya caअनुवाद
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर तथा धैर्य के द्वारा मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग कर और राग-द्वेष को नष्ट करके
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस साधक के आंतरिक अनुशासन का वर्णन करते हैं जो ब्रह्म-भाव को प्राप्त करने के योग्य बनता है। साधक को अपनी बुद्धि को शुद्ध रखना चाहिए और दृढ़ संकल्प के साथ मन तथा इंद्रियों को वश में करना चाहिए। उसे सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति और द्वेष दोनों का त्याग करना होता है ताकि वह ध्यान में स्थिर हो सके।
Translation
Endowed with a purified intellect, controlling the self with determination, abandoning sound and other sense objects, and casting aside attachment and aversion
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the inner discipline of a seeker who is fit for attaining the state of Brahman. The seeker must possess a purified intellect and control the mind and senses with firm resolve. By abandoning the attraction to sensory objects and freeing oneself from both attachment and aversion, one achieves the mental peace necessary for deep meditation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बुद्ध्या | बुद्धि से |
| विशुद्धया | विशुद्ध (पवित्र) |
| युक्तः | युक्त होकर |
| धृत्या | धैर्य के द्वारा |
| आत्मानम् | मन को (स्वयं को) |
| नियम्य | वश में करके |
| च | और |
| शब्दादीन् | शब्द आदि |
| विषयान् | विषयों को |
| त्यक्त्वा | त्याग कर |
| रागद्वेषौ | राग और द्वेष को |
| व्युदस्य | नष्ट करके (त्याग कर) |
| च | भी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| buddhyā | by intellect |
| viśuddhayā | purified |
| yuktaḥ | endowed |
| dhṛtyā | by determination (resolve) |
| ātmānam | the self (mind) |
| niyamya | controlling |
| ca | and |
| śabdādīn | sound and other |
| viṣayān | sense objects |
| tyaktvā | abandoning |
| rāgadveṣau | attachment and aversion |
| vyudasya | casting aside |
| ca | and |