Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.47
मूल श्लोक :
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का विस्तृत विवेचन तृतीय अध्याय में किया जा चुका है। स्वधर्म से तात्पर्य स्वयं के वर्ण एवं कर्तव्य कर्मों से है। वर्ण शब्द का स्पष्टीकरण किया जा चुका है। यह देखा जाता है कि मनुष्य के मन में रागद्वेष होने के कारण उसे अपना कर्म गुणहीन और अन्य पुरुष का कर्म श्रेष्ठ प्रतीत हो सकता है। उसके मन में ऐसी भावना के उदय होने पर वह स्वधर्म को त्यागकर परधर्म के आचरण में प्रवृत्त होता है। परन्तु? स्वभाव के प्रतिकूल होने के कारण वह उस नवीन कार्य में तो विफल होता ही है? साथ ही उसके मन में रागद्वेषों का अर्थात् वासनाओं का बन्धन और अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए? भगवान् कहते हैं? सम्यक् अनुष्ठित परधर्म से गुणरहित होने पर भी स्वधर्म का पालन ही श्रेष्ठतर है।स्वभाव नियत कर्माचरण से किल्विष अर्थात् पाप नहीं लगता। इसका अर्थ है स्वधर्म पालन से नवीन बन्धनकारक वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं।गीता का यह अन्तिम अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण के सुन्दर प्रवचन का उपसंहार है। अत? स्वाभाविक है कि यह सम्पूर्ण गीता का सारांश है। पूर्व अध्यायों में? अर्जुन के रोग के उपचार के लिए? जिन मुख्य सिद्धांतों का विवेचन किया गया था उनकी यहाँ पुनरावृत्ति की गई है।स्वधर्म पालन के उपदेश में दी गई युक्ति यह है कि स्वकर्माचरण पापोत्पत्ति का कारण नहीं बनता? यद्यपि हो सकता है कि उसमें कुछ दोष भी हो। इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि (1) विषैले सर्प का विष स्वयं सर्प का नाश नहीं करता (2) मदिरा में रहने वाला जीवित जीवाणु स्वयं मदोन्मत्त नहीं हो जाते और (3) मलेरिया के मच्छर स्वयं मलेरिया से पीड़ित नहीं होते। उसी प्रकार? किसी भी मनुष्य का स्वभाव उसके लिए दोषयुक्त या हानिकारक नहीं होता यदि सर्प के विष को मदिरा में मिला दिया जाये? तो वे जीवाणु नष्ट हो जायेंगे। ठीक इसी प्रकार? यदि ब्राह्मण के कर्म में क्षत्रिय पुरुष प्रवृत्त होता है? तो वह आत्मनाश ही कर लेगा। अर्जुन क्षत्रिय्ा था शुद्ध सत्त्वगुण के अभाव में यदि वह वनों में जाकर ध्यानाभ्यास करता तो वह उसमें कदापि सफल नहीं होता।सारांशत? अपने स्वभाव के प्रतिकूल कार्यक्षेत्र में प्रवृत्त होने से कोई लाभ नहीं होता है। इस जगत् में प्रत्येक वस्तु का निश्चित स्थान है। प्रत्येक प्राणी या मनुष्य का अपना महत्त्व है और कोई भी व्यक्ति तिरस्करणीय नहीं है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी ऐसे कार्य विशेष को कर सकता है? जिसे दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता। परमेश्वर की सृष्टि में बहुतायत अथवा निरर्थकता कहीं नहीं है। एक तृण की पत्ती भी? किसी काल या स्थान में? व्यर्थ ही उत्पन्न नहीं हुई है।क्या हमारा कर्म दोषयुक्त होने पर भी उसका पालन करना चाहिए भगवान् उत्तर में कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Better is one's own duty (though) destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin.
Transliteration
śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmāt svanuṣṭhitāt
svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣamअनुवाद
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से, गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से नियत किए हुए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वधर्म के पालन के महत्त्व पर बल देते हैं। भले ही किसी दूसरे का कर्तव्य देखने में अधिक सरल या आकर्षक लगे, फिर भी मनुष्य के लिए अपने स्वभाव के अनुकूल नियत कर्म करना ही श्रेयस्कर है। अपने सहज स्वभाव के अनुसार कर्म करने से मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता, क्योंकि वह प्रकृति के नियमों के अनुकूल कार्य कर रहा होता है।
Translation
Better is one’s own duty, though devoid of merit, than the duty of another well performed. Doing the duty prescribed by one’s own nature, one incurs no sin.
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes the importance of following one’s own prescribed duty (svadharma). Even if another’s duty seems more attractive or easier to perform, it is spiritually safer and better to perform one’s own duty, even if imperfectly. By performing actions aligned with one’s inherent nature, a person does not incur any sin.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रेयान् | श्रेष्ठतर |
| स्वधर्मः | अपना धर्म |
| विगुणः | गुणरहित (दोषयुक्त) |
| परधर्मात् | दूसरे के धर्म से |
| स्वनुष्ठितात् | अच्छी प्रकार आचरण किए हुए से |
| स्वभाव-नियतम् | स्वभाव से नियत किए हुए |
| कर्म | कर्म को |
| कुर्वन् | करता हुआ |
| न | नहीं |
| आप्नोति | प्राप्त करता है |
| किल्बिषम् | पाप को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śreyān | better |
| svadharmaḥ | one’s own duty |
| viguṇaḥ | devoid of merit |
| paradharmāt | than another’s duty |
| svanuṣṭhitāt | well-performed |
| svabhāva-niyataṃ | prescribed by one’s own nature |
| karma | action |
| kurvan | doing |
| na | not |
| āpnoti | incurs |
| kilbiṣam | sin |