Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.46
मूल श्लोक :
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब मनुष्य अपने स्वभाव (वर्ण) तथा स्वधर्म (आश्रम? जैसे ब्रह्मचर्य? गृहस्थ आदि) के अनुसार कर्म करता है तब उसकी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता जाता है। यह वासना निवृत्ति तथा इसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाली चित्त की शुद्धि और शान्ति तभी संभव होती है? जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करना सीख लेता है।लौकिक कर्तव्यों में यह नियम देखा जाता है कि जिस स्रोत से हमें कार्य करने की शक्ति और फल प्राप्ति होती है? उसके प्रीत्यर्थ कर्म करना हमारा कर्तव्य समझा जाता है। उदाहरणार्थ? सरकारी नौकरी करने वालों का कर्तव्य होता है कि अपने पद का कार्यभार सम्भालते हुए सरकार के लिए कार्य करें? क्योंकि सरकार ही उन्हें कार्य करने का अधिकार और वेतन प्रदान करती है। यदि कोई मनुष्य उस सरकार की शक्ति को विस्मृत कर अपने अधिकार का उपयोग स्वार्थसिद्धि में करता है? तो वह कर्म उसके लिए बन्धन कारक बन जाता है। इसके विपरीत अर्पण की भावना से कार्य करने पर बन्धन तो होते ही नहीं? अपितु उनकी पदोन्नति भी होती है। इसी प्रकार? हमको उस परमेश्वर का स्मरण करते हुए अपने कर्म करने चाहिए? जिससे हमें इन्द्रियाँ? मन आदि उपाधियों तथा उनकी क्षमताओं का प्राप्ति हुई है। हमारा कर्तव्य पालन ही ईश्वर की पूजा हो। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण का यही उपदेश है कि सभी वर्णाश्रमों के मनुष्यों को अपने कर्तव्यों के पालन द्वारा जगत्कारण परमात्मा का पूजन करना चाहिए।ईश्वरार्पण की भावना से कार्य करने में अहंकार सर्वथा लुप्त हो जाता है। अहंकार के अभाव में पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता है और नवीन बन्धनकारक वासनाएं उत्पन्न नहीं होती। इस प्रकार? कर्म के नियमानुसार लौकिक फल की प्राप्ति तो होती ही है? किन्तु उसके अतिरिक्त चित्त की शुद्धि भी प्राप्त होती है। जिसका अन्तकरण शुद्ध होता है? वही पुरुष परमात्मस्वरूप की अनुभूति को प्राप्त हो सकता है। यही वास्तविक सिद्धि है।इस प्रकार हम देखते हैं कि अपने कर्म के पालन में पूजन की भावना आ जाने पर हमारा कार्यक्षेत्र ही मन्दिर या तीर्थस्थान बन सकता है।स्वकर्म पालन में ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है इसलिए
English Translation By Swami Sivananda
He from Whom all the beings have evolved and by Whom all this is pervaded worshipping Him with his own duty, man attains perfection.
Transliteration
yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam
svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥअनुवाद
जिससे समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सब कुछ व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि अपने नियत कर्मों को केवल सांसारिक कार्य न मानकर, उन्हें ईश्वर की आराधना के रूप में करना चाहिए। चूंकि संपूर्ण सृष्टि परमात्मा से ही उत्पन्न हुई है और उसी से व्याप्त है, इसलिए अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना ही उनकी सच्ची पूजा है। इस प्रकार निष्काम भाव से कर्म करने वाला मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त करता है।
Translation
By worshipping Him from whom all beings originate and by whom all this is pervaded, through the performance of one’s own duty, a human being attains perfection.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains how one’s daily duties can be transformed into a spiritual practice. Since the Supreme Being is the source of all creation and pervades everything, performing one’s prescribed duties as an offering to Him is the highest form of worship. By doing so, a person purifies their mind and attains ultimate spiritual perfection.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यतः | जिससे |
| प्रवृत्तिः | उत्पत्ति (या चेष्टा) |
| भूतानाम् | प्राणियों की |
| येन | जिसके द्वारा |
| सर्वम् | सब कुछ |
| इदम् | यह |
| ततम् | व्याप्त है |
| स्व-कर्मणा | अपने स्वाभाविक कर्म के द्वारा |
| तम् | उस (परमेश्वर) को |
| अभ्यर्च्य | पूजकर |
| सिद्धिम् | सिद्धि को |
| विन्दति | प्राप्त करता है |
| मानवः | मनुष्य |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yataḥ | from whom |
| pravṛttiḥ | the origin (or activity) |
| bhūtānām | of all living beings |
| yena | by whom |
| sarvam | all |
| idam | this |
| tatam | is pervaded |
| sva-karmaṇā | by one’s own duty |
| tam | Him |
| abhyarcya | by worshipping |
| siddhim | perfection |
| vindati | attains |
| mānavaḥ | a human being |