श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.45

मूल श्लोक :

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अपनेअपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि(परमात्मा)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अपने स्वभाव एवं विकास की स्थिति को पहचान कर प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वाभाविक कर्म का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। इसी कर्तव्य पालन से प्रथम चित्तशुद्धि एवं तदुपरान्त परमात्मस्वरूप की अनुभूति की संसिद्धि प्राप्त हो सकती है।केवल सतही दृष्टिकोण से अवलोकन करने पर मनुष्यों का उपर्युक्त चतुर्विध वर्गीकरण स्पष्टत बोधगम्य नहीं हो सकता। परन्तु जीवन में श्रेष्ठ उपलब्धियों को प्राप्त किये महान् पुरुषों के जीवन चरित्र इस वर्गीकरण की सत्यता का बारम्बार उद्घोष करते हैं। एक छोटे से बालक ने भेड़ पालन के कार्य को अस्वीकार कर दिया और पेरिस जा पहुँचा? जो कालान्तर में विश्व में नेपोलियन के नाम से प्रसिद्ध महानतम सेनापति बना। गोल्डस्मिथ या कीट्स व्यापारिक कार्य द्वारा आराम एवं सुखसुविधाओं का जीवन जीने की अपेक्षा किसी अटारी में रहते हुए काव्य रचना करना अधिक पसन्द करेगा। प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुरूप कार्यक्षेत्र में कर्म करते हुए ही सुख एवं पूर्णता का अनुभव करता है।मानव के लौकिक व्यवहार? मानसिक स्वभाव एवं बौद्धिक अभिरुचि के आधार पर किया गया यह विवकपूर्ण वर्गीकरण केवल भारत में ही नहीं? वरन् सर्वत्र प्रयोज्य (लागू करने योग्य) है। जीवन में इसकी प्रयोज्यता तथा मनुष्य के विकास के लिए इसकी उपादेयता सार्वभौमिक है।अब भगवान् श्रीकृष्ण सिद्धि प्राप्ति की साधना बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Each man devoted to his own duty attains perfection. How he attains perfection while being engaged in his own duty, hear now.

Transliteration

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu

अनुवाद

अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त करता है, उस विधि को तुम सुनो।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार नियत कर्मों को करके भी परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसके लिए संन्यास या गृहत्याग अनिवार्य नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्य को ईश्वर-अर्पण बुद्धि से करना ही पर्याप्त है। अब वे उस विधि को बताने जा रहे हैं जिससे स्वकर्म करते हुए सिद्धि मिलती है।

Translation

Devoted to his own particular duty, a human being attains perfection. How one who is engaged in his own duty attains perfection, hear that from Me.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that by performing one’s own prescribed duties according to one’s nature, a person can attain ultimate perfection. Renunciation of action is not necessary; rather, performing one’s duty as an offering to the Divine is key. Krishna now promises to explain the process by which this perfection is achieved.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
स्वेअपने
स्वेअपने
कर्मणिकर्म में
अभिरतःलगा हुआ
संसिद्धिम्परम सिद्धि को
लभतेप्राप्त करता है
नरःमनुष्य
स्वकर्म-निरतःअपने कर्म में लगा हुआ
सिद्धिम्सिद्धि को
यथाजिस प्रकार
विन्दतिप्राप्त करता है
तत्उसको
शृणुसुनो

Word by word

WordMeaning
svein one’s own
svein one’s own
karmaṇiduty
abhirataḥintent on
saṃsiddhimperfection
labhateattains
naraḥa man
svakarma-nirataḥone dedicated to his own duty
siddhimperfection
yathāhow
vindatiattains
tatthat
śṛṇuhear