श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.43

मूल श्लोक :

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

शूरवीरता? तेज? धैर्य? प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता? युद्धमें कभी पीठ न दिखाना? दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

क्षत्रिय पुरुष में रजोगुण की प्रधानता होती है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण? किसी क्षत्रिय कुल में जन्मे व्यक्ति को ही क्षत्रिय नहीं कहते हैं। एक सच्चे क्षत्रिय पुरुष में जो गुण होते हैं? उनकी ही यहाँ गणना की गयी है। गीता में वर्णों का विभाजन मनुष्य के आन्तरिक स्वभाव एवं बाह्य आचरण के आधार पर किया गया है।शौर्य तेज से सम्पन्न व्यक्ति ही प्रजा का पालन एवं शासन करने में समर्थ होता है।धृति  अपने लक्ष्य को दृढ़ता से धारण करना धृति है। मार्ग में कितने ही विघ्नों के आने पर भी अपने पथ से विचलित न होने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है? जिसे ही धृति कहते हैं।दाक्ष्य  अर्थात् दक्षता। सैनिक प्रशिक्षण की भाषा में इसे सावधान का आदेश कहा जाता है। दक्षता का अर्थ है प्राप्त परिस्थिति का तत्काल और यथार्थ मल्यांकन करने की क्षमता। इसमें निर्णय के अनुसार तत्काल उसे कार्यान्वित करने की क्षमता का भी समावेश है। एक सच्चे क्षत्रिय की दक्षता अन्य लोगों के लिए ईर्ष्या का विषय बन जाती है।युद्ध से अपलायन  उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष जीवन संघर्षों में सहज ही अपनी पराजय स्वीकार नहीं कर लेता। यहाँ युद्ध शब्द का वाच्यार्थ ही नहीं लेना चाहिए। जीवन में जो भी कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं? उन सबका साहस के साथ सामना करना यहाँ अभिप्रेत है। न्याय्य लक्ष्य के विरुद्ध खड़ी होने वाली परिस्थितियों से पलायन न करना क्षत्रिय का धर्म है।दान  कोई भी शासन या राजा तभी लोकप्रिय बनता है? जब वह मुक्तहस्त से दान करता है। वर्तमान समय में भी सभी प्रजातान्त्रिक राज्यों की सरकारें अपने बजट में कुछ धन की मात्रा सुरक्षित रखती हैं? जिस पर किसी प्रकार का विवाद या मतदान नहीं होता। क्षत्रिय पुरुष के कृपण होने पर उसे अपने कार्य में सफलता नहीं मिल सकती? क्योंकि उसकी सफलता उसके मित्रों एवं समर्थकों की संख्या पर निर्भर करती है। एक न्यायप्रिय क्षत्रिय को दयापूर्वक असहाय लोगों की मुक्तहस्त से सहायता करनी चाहिए।ईश्वरभाव  अपनी सार्मथ्य पर दृढ़विश्वास के बिना कोई भी पुरुष शासन नहीं कर सकता। प्रजा के नेता में इतना दृढ़ आत्मविश्वास होना चाहिए कि उसके विश्वास से अन्य दुर्बल हृदय के लोगों का भी आत्मविश्वास जागृत हो उठे। इस प्रकार का ईश्वर भाव एक क्षत्रिय के लिए आवश्यक गुण है। उसकी शक्तिशाली उपस्थिति से ही आसपास के वातावरण में विद्युत् शक्ति कासा संचार हो जाना चाहिए। मात्र मुकुट या राजवस्त्रों से ही कोई पुरुष राजा नहीं बन सकता। राजमुकुट? राजवस्त्र एवं राजसिंहासन को अपने योग्य शासन का चयन कर सकने की अद्भुत कला प्राप्त है। ईश्वरभाव क्षत्रिय का सबसे प्रमुख लक्षण है।उपर्युक्त आठ गुणों को क्षात्र कर्म कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि एक क्षत्रिय पुरुष को इन गुणों को सम्पादित करके इन्हें धारण करना चाहिए। लौकिक सत्ता के धारक नेता अध्यात्म के पथ प्रदर्शक नहीं बन सकते। परन्तु एक सच्चे शासक में यह सूक्ष्म क्षमता होनी चाहिए कि वह आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को अपनी शासन प्रणाली में सम्मिलित कर सके और राष्ट्र के विविध कार्यक्षेत्रों में उन्हें व्यवहारिक रूप प्रदान कर सके।अगले श्लोक में वैश्य और शूद्र के कर्म बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Prowess, splendour, firmness, dexterity and also not fleeing from battle, generosity and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of (their own) nature.

Transliteration

śauryam tejo dhṛtir dākṣyam yuddhe cāpy apalāyanam
dānam īśvarabhāvaś ca kṣātram karma svabhāvajam

अनुवाद

शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामी-भाव — ये सब ही क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण क्षत्रिय वर्ण के स्वाभाविक गुणों और कर्तव्यों का वर्णन करते हैं। एक क्षत्रिय में वीरता, तेजस्विता, धैर्य, प्रशासनिक दक्षता, युद्धभूमि से न भागने का संकल्प, दानशीलता और नेतृत्व की क्षमता स्वाभाविक रूप से होनी चाहिए। ये गुण उनके अंतर्निहित स्वभाव (गुण और कर्म) से उत्पन्न होते हैं।

Translation

Heroism, majesty, firmness, dexterity, and also not fleeing from battle, generosity, and lordliness are the duties of a Kshatriya, born of his own nature.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the natural qualities and duties of a Kshatriya (the warrior and administrator class). A Kshatriya naturally possesses heroism, splendor, fortitude, resourcefulness, courage in battle, generosity, and leadership. These duties and characteristics flow from their inherent nature and disposition.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
शौर्यम्शूरवीरता
तेजःतेज (प्रभावशीलता)
धृतिःधैर्य (धारण शक्ति)
दाक्ष्यम्चतुरता (दक्षता)
युद्धेयुद्ध में
और
अपिभी
अपलायनम्न भागना
दानम्दान देना
ईश्वरभावःस्वामी-भाव (नेतृत्व)
और
क्षात्रम्क्षत्रिय का
कर्मकर्म
स्वभावजम्स्वभाव से उत्पन्न

Word by word

WordMeaning
śauryamheroism
tejaḥsplendor
dhṛtiḥfortitude
dākṣyamdexterity
yuddhein battle
caand
apialso
apalāyanamnot fleeing
dānamgenerosity
īśvarabhāvaḥlordliness
caand
kṣātramof a Kshatriya
karmaduty
svabhāvajamborn of one’s own nature