Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.40
मूल श्लोक :
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
उपर्युक्त श्लोक के साथ सभी प्राणियों पर? और विशेष रूप से मनुष्य के व्यक्तित्व पर? पड़ने वाले तीन गुणों के प्रभाव का विवेचन समाप्त होता है। इस सम्पूर्ण प्रकरण में विभिन्न मनुष्यों के विभिन्न व्यक्तित्व और उनके व्यवहार की विविधता का भी मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया गया है। ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृति के विस्तृत विश्लेशण के द्वारा मनुष्यों का वर्णन किया गया है।इस प्रकरण में एक मात्र प्रयोजन हमारा मार्गदर्शन करना है। इसके अध्ययन के द्वारा हम अपनी स्थिति? अपने आन्तरिक तथा बाह्य व्यवहार को भलीभांति जान सकते हैं।यदि हम अपने को राजस या तामस की श्रेणी में पाते हैं तो हम आत्म विकास के साधकों को तत्काल सजग होकर सत्त्वगुण में निष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्मरण रहे? और मैं पुन दोहराता हूँ कि हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि पूर्वोक्त समस्त वर्गीकरण परपरीक्षण के लिए न होकर आत्मनिरीक्षण तथा आत्मानुशासन के लिए हैं।इन तीन गुणों के वर्णन का कारण यह है कि सम्पूर्ण विश्व पृथ्वी और स्वर्ग में कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो प्रकृति के इन त्रिगुणों से रहित हो। स्वयं प्रकृति ही त्रिगुणात्मिका है। इसलिए? उससे उत्पन्न हुए समस्त प्राणी भी उसके गुणों से युक्त हैं। कोई भी व्यक्ति त्रिगुणों की सीमा का उल्लंघन करके जगत् में कार्य नहीं कर सकता।परन्तु? कोई भी दो प्राणी बाह्य जगत् में समान रूप से व्यवहार नहीं करते हैं। इसका कारण है दोनों में इन तीन गुणों के अनुपात की भिन्नता। इस त्रिगुणात्मिका प्रकृति को ही वेदान्त में माया कहते हैं? जो प्रत्येक जीव को विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करती है और जिसके वश में सभी जीव रहते हैं।चाय के प्रत्येक प्याले में तीन संघटक तत्त्व होते हैं चाय का अर्क? दूध और चीनी? परन्तु प्याले में इन तीनों के मिश्रण का भिन्नभिन्न अनुपात होने पर उन प्यालों के चाय के स्वाद में भी विविधता होगी। जो पुरुष त्रिगुणातीत आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है? केवल वही पुरुष सर्वाधिष्ठान एक परमात्मा को पहचान सकता है। वही पुरुष इस नामरूपमय सृष्टि को परमात्मा की लीला के रूप में देख सकता है। इसलिए? प्रतिदिन? प्रतिक्षण हम आत्मनिरीक्षण करके अपनी स्थिति को जानने का प्रयत्न करें। राजसी व तामसी स्थिति से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में स्थित होने का हमको प्रयत्न करना चाहिए। शुद्ध सत्त्वगुण में निष्ठा प्राप्त होने पर ही हम सत्त्वातीत आत्मा का अनुभव प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं।इन तीन गुणों के आधार पर ही भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी मनुष्यों का सात्त्विक? राजसिक और तामसिक तीन विभागों में वर्गीकरण किया है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में गुण प्राधान्य के आधार पर मनुष्यों का चतुर्विध विभाजन किया गया है जो चातुर्र्वण्य के नाम से प्रसिद्ध है। यह वर्गीकरण मानव मात्र का होने के कारण उसकी प्रयोज्यता सार्वभौमिक है? न कि केवल भारतवर्ष तक ही सीमित है। यह चतुर्विध विभाजन केवल अनुवांशिक गुण अथवा जन्म के संयोग के आधार पर न होकर प्रत्येक व्यक्ति के अपने विशिष्ट गुणों के अनुसार है। निम्न तालिका से यह विभाजन स्पष्ट हो जायेगा उपर्युक्त विभाजन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। अर्वाचीन भाषा में इन चार वर्णों का नामकरण इस प्रकार किया जा सकता है (1) रचनात्मक विचार करने वाले चिन्तक? (2) राजनीतिज्ञ? (3) व्यापारी वर्ग? और (4) श्रमिक वर्ग। इसमें एक बात स्पष्ट देखी जा सकती है कि किस प्रकार वेतनभोगी श्रमिक अपने नियोक्ता स्वामी (व्यापारी) से भयभीत होता है? व्यापारी वर्ग राजनीतिज्ञों से आशंकित रहता है और राजनीतिज्ञ लोग? साहसी और स्वतन्त्र विचार करने वाले चिन्तकों से भयकम्पित होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन की शिखर वार्ता के सन्दर्भ में चातुर्र्वण्य का वर्णन करने का अपना प्रयोजन है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि वह क्षत्रिय वर्ण का है और? इसलिए? धर्मयुद्ध से पलायन करना उसे शोभा नहीं देता। उसका कर्तव्य धर्म पालन एवं धर्म रक्षण करना है। ब्राह्मणों के स्वभाव अर्थात् सत्त्वाधिक्य को प्राप्त किये बिना वह सफलतापूर्वक ध्यानाभ्यास नहीं कर सकता। अत? अर्जुन के लिए वासनाक्षय का एक मात्र साधन रह जाता है क्षत्रिय धर्म का पालन करना।अगले श्लोकों में वर्णाश्रम धर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है। स्वभाव से प्राप्त धर्म तथा आश्रम अर्थात् जीवन की स्थिति (ब्रह्मचर्य? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास) के अनुकूल कर्तव्यों का यहाँ वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
There is no being on earth or again in heaven among the gods, that is liberated from the three alities born of Nature.
Transliteration
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ
sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥअनुवाद
पृथ्वी पर या फिर स्वर्ग में देवताओं के बीच ऐसा कोई भी अस्तित्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भौतिक संसार में कोई भी प्राणी प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) के प्रभाव से अछूता नहीं है। चाहे वह पृथ्वी का मनुष्य हो या स्वर्ग के देवता, सभी प्रकृति के इन नियमों के अधीन हैं। केवल वही जो गुणातीत (गुणों से परे) हो जाता है, वही इस बंधन से मुक्त हो पाता है।
Translation
There is no being on earth, or again in heaven among the demigods, that is free from these three qualities born of nature.
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes that no entity in the material world is free from the influence of the three modes of nature (sattva, rajas, and tamas). Whether on earth or among the celestial beings in heaven, everyone is bound by these natural qualities. Only one who transcends these modes can attain true liberation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| तत् | वह |
| अस्ति | है |
| पृथिव्याम् | पृथ्वी पर |
| वा | या |
| दिवि | स्वर्ग में |
| देवेषु | देवताओं में |
| वा | या |
| पुनः | फिर |
| सत्त्वम् | अस्तित्व (प्राणी) |
| प्रकृतिजैः | प्रकृति से उत्पन्न |
| मुक्तम् | मुक्त |
| यत् | जो |
| एभिः | इन |
| स्यात् | हो |
| त्रिभिः | तीनों |
| गुणैः | गुणों से |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| tat | that |
| asti | there is |
| pṛthivyām | on earth |
| vā | or |
| divi | in heaven |
| deveṣu | among the demigods |
| vā | or |
| punaḥ | again |
| sattvam | being / existence |
| prakṛtijaiḥ | born of material nature |
| muktam | liberated / free |
| yat | which |
| ebhiḥ | from these |
| syāt | would be |
| tribhiḥ | three |
| guṇaiḥ | modes / qualities |