श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.4

मूल श्लोक :

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः।।18.4।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।18.4।।(टिप्पणी प0 871.2) हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

।।18.4।। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे त्याग के स्वरूप का सम्पूर्ण विवेचन करेंगे।सामान्य मनुष्य के लिए किसी प्रकार का भी त्याग करना सरल कार्य़ नहीं होता संचय और समृद्धि मानो मन के प्राण ही हैं। इसलिए? स्वाभाविक है कि अर्जुन के श्रेष्ठ गुणों को जागृत करने के लिए भगवान् उसे भरतसत्तम और पुरुषव्याघ्र कहकर सम्बोधित करते हैं।अध्ययन की दृष्टि से त्याग का तीन भागों में वर्गीकरण किया गया है। सम्पूर्ण गीता में यह त्रिविध वर्गीकरण पाया जाता है? और वे तीन वर्ग हैं सात्त्विक? राजसिक और तामसिक।भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

18.4 Hear from Me the conclusion or the final truth about this abandonment, O best of the Bharatas; abandonment, verily, O best of men, has been declared to be of three kinds.