श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.36

मूल श्लोक :

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है? ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है? वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस अध्याय में प्रतिपादित विचारों के विकास क्रम में सर्वप्रथम कार्य सम्पादन के तीन तत्त्वों  ज्ञान? कर्ता और कर्म का वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् कर्म के प्रेरक? नियामक और मार्गनिर्देशक दो तत्त्वों? बुद्धि और धृति का विस्तृत विवेचन किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण ने इन सब के त्रिविध भेदों को पृथक्पृथक् रूप से दर्शाया है।प्रत्येक कर्ता अपने कर्मक्षेत्र में? अपने ज्ञान से निर्देशित बुद्धि से शासित और धृति से लक्ष्य को धारण करके कर्म करता है। इस प्रकार कार्य की शारीरिक एवं प्राणिक संरचना का विश्लेषण एवं निरीक्षण पूर्ण होता है। अब? विचार्य विषय है कार्य का मनोविज्ञान। मनुष्य किस लिए कर्म करता है  प्राणियों की प्रवृत्तियों का अवलोकन करने से यह ज्ञात होता है कि प्रत्येक प्राणी केवल सुख प्राप्ति के लिए ही कर्म में प्रवृत होता है। गर्भ से लेकर शवागर्त तक? प्राणियों के समस्त प्रयत्न सतत सुख प्राप्त करने के लिए ही होते हैं।इस प्रकार? यद्यपि सबका एक लक्ष्य सुख ही है? तथापि ज्ञान? कर्ता? कर्म बुद्धि और धृति में भेद होने से विभिन्न लोगों के द्वारा अपनाये गये सुख प्राप्ति के मार्ग भी भिन्नभिन्न होते हैं। सात्त्विक? राजसिक और तामसिक लोग विविध कर्मों के द्वारा अपनेअपने सुख की खोज करते हैं।कर्म के संघटकों में भेद होने के कारण उन विभिन्न प्रकार के कर्मों से प्राप्त सुखों में भेद होना अनिवार्य है। प्रस्तुत प्रकरण में सुख के तीन प्रकारों का वर्गीकरण किया गया है।अभ्यासात्  इस अध्याय में वर्णित वर्गीकरण को समझकर एक सच्चे साधक को आत्मनिरीक्षण की सार्मथ्य प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार? अपने दुखों के कारण को समझने से उनका परित्याग कर वह अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित कर सकता है। ऐसे अभ्यास से उसके दुखों का सर्वथा अन्त हो जाना संभव है।सात्त्विक सुख क्या है  भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

And now hear from Me, O Arjuna, of the threefold pleasure, in which one rejoices by practice and surely comes to the end of pain.

Transliteration

sukhaṃ tv idānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha
abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati

अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुख के विषय में भी सुनो जिस सुख में मनुष्य अभ्यास (साधना) के द्वारा रमण करता है और जिससे दुखों का अंत हो जाता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को तीन प्रकार के सुखों के विषय में बताना आरम्भ कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस सुख का अनुभव मनुष्य निरंतर अभ्यास या साधना के द्वारा करता है, वह अंततः सभी दुखों का नाश करने वाला होता है। यह सुख भौतिक इंद्रिय-भोगों से भिन्न है, जो क्षणिक होते हैं।

Translation

O best of the Bharatas, now hear from Me about the three kinds of happiness that in which one rejoices through practice and by which one reaches the end of all pain

Meaning

In this verse, Lord Krishna begins to describe the three kinds of happiness to Arjuna. He explains that the happiness which one learns to enjoy through long practice and discipline leads to the complete cessation of all sorrow. This is distinct from fleeting, sensory pleasures.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सुखम्सुख को
तुतो
इदानीम्अब
त्रिविधम्तीन प्रकार के
शृणुसुनो
मेमुझसे
भरतर्षभहे भरतश्रेष्ठ
अभ्यासात्अभ्यास से
रमतेरमण करता है (आनन्द लेता है)
यत्रजिसमें
दुःख-अन्तम्दुखों के अंत को
चऔर
निगच्छतिप्राप्त करता है

Word by word

WordMeaning
sukhamhappiness
tuindeed
idānīmnow
trividhamof three kinds
śṛṇuhear
mefrom Me
bharatarṣabhaO best of the Bharatas
abhyāsātby practice
ramaterejoices
yatrain which
duḥkha-antamthe end of pain
caand
nigacchatiattains