श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.33

मूल श्लोक :

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है? वह धृति सात्त्विकी है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

,विचाराधीन खण्ड में तीन प्रकार की धृतियों का वर्णन किया गया है। मनुष्य की वह क्षमता धृति कहलाती है? जिसके द्वारा वह अपने इच्छित और निर्धारित लक्ष्य को अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देता। इसी धारणाशक्ति की सहायता से वह? लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर पर्वताकार विघ्नों के आने पर भी अपने प्रयोजन का सातत्य बनाये रखता है। धृति हमारे लक्ष्य को चित्रित करती है? उसे दृष्टि से ओझल नहीं होने देती? हमें प्रयत्नशील बनाती है तथा बाधाओं के उत्पन्न होने पर हममें वह ऐसी गुप्त शक्तियों का संगठन करती है? जिससे कि हम साहस? शौर्य और दृढ़ता के साथ उन बाधाओं का सामना कर सकें। धृति शब्द के द्वारा उपर्युक्त समस्त आशयों को इंगित समझना चाहिए।मनुष्य को जीवन में? चेतना? गौरव और अभूतपूर्व सफलता प्रदान करने में समर्थ यह धारणाशक्ति (धृति) उन विलासी लोगों में नहीं पायी जाती? जो सदैव विषयोपभोग में रमते हैं और जिनमें आत्मसंयम का सर्वथा अभाव होता है। विपरीत विचार तथा मिथ्या जीवन जीने वाले विघटित व्यक्तित्व के पुरुषों में धृति संभव नहीं है। त्रिगुणों के भेद से यहाँ धृति का तीन भागों  सात्विक? राजसिक और तामसिक में वर्गीकरण किया गया है। परन्तु सब में? ध्यान देने योग्य बात यह है कि धृति का अर्थ धारणा ही है? जिसके कारण विभिन्न व्यक्ति अपनी बुद्धि के द्वारा निश्चित किये गये लक्ष्य को दृढ़ता से धारण किये रहते हैं।जिस धृति द्वारा एक साधक अपने मन? इन्द्रियों तथा उनकी क्रियाओं को योगाभ्यास तथा एक लक्ष्यानुसंधान की सहायता से संयमित करता है? वह सात्त्विक धृति है।कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ स्वभावत विषयाभिमुखी होती हैं। केवल मन ही उनका संयमन कर सकता है। परन्तु संयमन के इस कार्य के लिए मन को आवश्यक शक्ति और उत्साह प्राप्त करने हेतु एक लक्ष्य का होना अनिवार्य हो जाता है। निम्नस्तरीय भोगों से निवृत्त होने के लिए लक्ष्य का उच्च और श्रेष्ठ होना भी आवश्यक है? अन्यथा इन्द्रियसंयम असंभव है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ध्यान योग की अपरिहार्यता पर विशेष बल देते हैं।अखण्ड आत्मानुसंधान की साधना से साधक को स्थिरता और संतुलन? शान्ति और सन्तोष प्राप्त होता है। इनकी सार्मथ्य से ही वह इन्द्रियसंयम में सफल हो सकता है। परन्तु इन समस्त उपलब्धियों का मूल है? धृति अर्थात् धारणा शक्ति या धैर्य। श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होने वाली धृति सात्त्विकी कहलाती है।

English Translation By Swami Sivananda

The unwavering firmness by which, through Yoga, the functions of the mind, the life-force and the senses are restrained  that firmness, O Arjuna, is Sattvic (pure).

Transliteration

dhṛtyā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥ
yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī

अनुवाद

हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी (एकाग्र) धारणा-शक्ति के द्वारा मनुष्य योग से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण सात्त्विक धृति (धैर्य या संकल्प-शक्ति) की परिभाषा देते हैं। सात्त्विक धृति वह है जो योग के माध्यम से मन, प्राण और इन्द्रियों की चंचल क्रियाओं को नियंत्रित और अनुशासित रखती है। ऐसी संकल्प-शक्ति में कोई भटकाव या स्वार्थ नहीं होता, और यह मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अडिग रखती है।

Translation

O Partha, that unwavering resolve by which one controls the activities of the mind, life-breaths, and senses through yoga, is of the nature of goodness (sattvika)

Meaning

In this verse, Lord Krishna defines the sattvika (pure) resolve or determination. Sattvika determination is that which, through the practice of yoga, regulates and controls the activities of the mind, life-forces, and senses. Such unwavering resolve is free from selfish distractions and keeps an individual firmly on the path of self-realization.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
धृत्याधैर्य या संकल्प-शक्ति के द्वारा
ययाजिसके द्वारा
धारयतेधारण करता है (नियंत्रित करता है)
मनःमन की
प्राणप्राणों की
इन्द्रियऔर इन्द्रियों की
क्रियाःक्रियाओं को
योगेनयोग के द्वारा
अव्यभिचारिण्याअव्यभिचारिणी (अविचलित या एकाग्र)
धृतिःवह धृति (संकल्प)
सावह
पार्थहे अर्जुन (प्रथापुत्र)
सात्त्विकीसात्त्विकी है

Word by word

WordMeaning
dhṛtyāby the determination
yayāby which
dhārayateone sustains or controls
manaḥof the mind
prāṇaof the life-breaths
indriyaand of the senses
kriyāḥthe activities
yogenaby yoga (concentration)
avyabhicāriṇyāunswerving / unwavering
dhṛtiḥdetermination
that
pārthaO Partha (Arjuna)
sāttvikīis of the nature of goodness (sattvika)