Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.30
मूल श्लोक :
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकीHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पृथानन्दन जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको? कर्तव्य और अकर्तव्यको? भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है? वह बुद्धि सात्त्विकी है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वह बुद्धि सर्वोच्च मानी जाती है? जो अपने कार्यक्षेत्र की वस्तुओं? व्यक्तियों एवं घटनाओं को यथार्थ रूप में तत्परता से समझ सकती है। बुद्धि के अनेक कार्य हैं? जैसे निरीक्षण? विश्लेषण? वर्गीकरण? संकल्पना? कामना? स्मरण करना इत्यादि तथापि इन सब में जिस क्षमता की आवश्यकता होती है? वह है विवेक की क्षमता। विवेक के बिना यथार्थ निरीक्षण? निर्णय आदि असंभव हैं। अत बुद्धि का मुख्य कार्य है? विवेक।प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दो शब्दों के परिभाषिक अर्थ क्रमश कर्ममार्ग और संन्यास मार्ग हैं। एक साधक को इन दोनों के वास्तविक स्वरूप को समझकर स्वयं की अभिरुचि एवं क्षमता के अनुसार किसी एक मार्ग का यथायोग्य अनुरक्षण करना चाहिये। अन्यथा कोई साधक कर्म में ही आसक्त होकर रह जायेगा? तो अन्य साधक संन्यास के नाम पर केवल पलायन ही करेगंे।कार्य और अकार्य सत्य और मिथ्या का विवेक करने वाली बुद्धि का प्रयोजन? कार्य और अकार्य अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक करना भी है। मनुष्य को यह जानना आवश्यक होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य और उचित हैं तथा कौन से कर्म निषिद्ध और अनुचित हैं। इस विवेक के न होने पर मनुष्य कभीकभी क्रोधावेश या मिथ्या अभिमान के कारण अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे देता है? जिसका उसे कालान्तर में पश्चाताप होता है। अर्जुन ने भी मानसिक उन्माद की स्थिति में इस विवेक को खो दिया था? जिसका मुख्य कारण उसका मित्र? बन्धु? परिवार से अत्याधिक स्नेह ही था।भय और अभय मूढ़ लोग अत्याधिक विषयासक्ति के कारण अवैध? अनैतिक और अधार्मिक कार्य करने से भयभीत नहीं होते परन्तु शास्त्रों का अध्ययन और आत्मानुसंधान जैसे श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त होने में उन्हें भय प्रतीत होता है। संन्यास और वैराग्य जैसे शब्दों से भी उन्हें डर लगता है। अत वह बुद्धि सात्त्विक है? जो भय और अभय के कारणों का सम्यक् प्रकार से विवेक कर सकती है।बन्ध और मोक्ष अपने सच्चिदानन्दस्वरूप के अज्ञान से ही हम विषयों से सुख प्राप्ति की कामना करके कर्म में प्रवृत्त होते हैं। कर्मफल के उपभोग से वासनाएं उत्पन्न होती हैं? जो पुन हमें कर्म में प्रवृत्त करती रहती हैं। ये अज्ञानजनित वासनाएं ही हमारे बन्धन को दृढ़ करती हैं। अत आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान के नाश से ही हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। जो बुद्धि बन्धन के कारण और मोक्ष के साधन को तत्त्वत जानती है? वही सात्त्विक बुद्धि है।सारांशत? प्रवृत्ति और निवृत्ति? कार्याकार्य? भयाभय और बन्धमोक्ष के स्वरूप को यथावत् पहचानने वाली बुद्धि सात्त्विक है।सात्त्विक बुद्धि मरुस्थल में भी सुन्दर उपवन की रचना कर सकती है और विफलता की प्रत्येक आशंका से सफलता का सम्पादन कर सकती है। बुद्धि और धृति के बिना जीवन में प्राप्त होने वाले सुअवसर भी विपत्ति के कारण बन जाते हैं अथवा धूलि में मिल जाते हैं। सात्त्विक बुद्धि घोरतम त्रासदियों को श्रेष्ठतम सुख समृद्धियों में परिवर्तित कर सकती है।राजसी बुद्धि क्या है सुनो
English Translation By Swami Sivananda
The intellect which knows the path of work and renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, bondage and liberation that intellect is Sattvic (pure), O Arjuna.
Transliteration
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikīअनुवाद
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सात्त्विक बुद्धि के लक्षणों का वर्णन करते हैं। सात्त्विक बुद्धि वह है जो धर्म और अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच स्पष्ट अंतर कर सकती है। यह मनुष्य को सही मार्ग चुनने और बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करने में मार्गदर्शन करती है।
Translation
O Partha, that intellect by which one knows path of action and the path of renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, and bondage and liberation, is sattvika
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a sattvika (pure) intellect. A sattvika intellect is capable of clearly distinguishing between action and inaction, duty and non-duty, fear and fearlessness, and bondage and liberation. It guides a person toward the right path, leading ultimately to spiritual freedom.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रवृत्तिम् | प्रवृत्ति मार्ग को (कर्म मार्ग को) |
| च | और |
| निवृत्तिम् | निवृत्ति मार्ग को (संन्यास मार्ग को) |
| च | और |
| कार्य | कर्तव्य कर्म को |
| अकार्ये | और अकर्तव्य कर्म को |
| भय | भय को |
| अभये | और अभय को |
| बन्धम् | बन्धन को |
| मोक्षम् | मोक्ष को |
| च | और |
| या | जो |
| वेत्ति | जानती है |
| बुद्धिः | बुद्धि |
| सा | वह |
| पार्थ | हे पार्थ (अर्जुन) |
| सात्त्विकी | सात्त्विकी है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| pravṛttim | the path of active engagement |
| ca | and |
| nivṛttim | the path of renunciation |
| ca | and |
| kārya | what ought to be done |
| akārye | and what ought not to be done |
| bhaya | fear |
| abhaye | and fearlessness |
| bandham | bondage |
| mokṣam | liberation |
| ca | and |
| yā | which |
| vetti | knows |
| buddhiḥ | intellect |
| sā | that |
| pārtha | O Partha (Arjuna) |
| sāttvikī | is sattvika (pure) |