Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.26
मूल श्लोक :
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो कर्ता रागरहित? अनहंवादी? धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है? वह सात्त्विक कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अब तक भगवान् श्रीकृष्ण ने त्रिविध ज्ञान और कर्म का वर्णन किया था। कर्म का तीसरा अंग है? कर्ता जीव? जो कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है। प्रकृति के तीन गुण हम सबके मानसिक जीवन एवं बौद्धिक क्षमताओं को प्रभावित करते हैं। स्वाभाविक ही है? कि किसी एक गुण के आधिक्य या प्राधान्य से हमारे कर्तृत्व में भी समयसमय पर परिवर्तन होता रहता है। अत यहाँ कर्ता का भी तीन भागों में वर्गीकरण किया गया है। सर्वप्रथम? भगवान् श्रीकृष्ण सात्त्विक कर्ता का वर्णन करते हैं।मुक्तसंग और अनहंवादी ये दो विशेषण सात्त्विक कर्ता के हैं। जो पुरुष कर्म के फल? जगत् की वस्तुओं तथा व्यक्तियों से आसक्ति रहित है? वह सात्त्विक कर्ता है। वह जानता है कि स्वयं से भिन्न किसी भी वस्तु में वह सुख नहीं है? जो उसके जीवन को पूर्ण और कृतार्थ कर सके। इसलिए वह किसी में आसक्ति नहीं रखता। अहंवादी का अर्थ है वह पुरुष? जो अपनी उपलब्धियों और सफलताओं का कर्ता स्वयं को ही मानकर सदैव गर्वयुक्त भाषण करता है? परन्तु सात्त्विक पुरुष में यह अहंमन्यता नहीं होती? क्योंकि उसका यह दृढ़ एवं निश्चयात्मक ज्ञान होता है कि कोई भी उपलब्धि एक अकेले पुरुष की कभी नहीं हो सकती।ईश्वर प्रदत्त क्षमताएं? प्राकृतिक नियम तथा अन्य जनों के सहयोग से ही सफलता सम्पादित की जा सकती है। इस ज्ञान के कारण उसे कभी यह गर्व नहीं होता कि उसने कोई अभूतपूर्व कार्य किया है। वह अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है।ऐसे मुक्तसंग और अनहंवादी पुरुष में असीम धैर्य और कार्य के प्रति उत्साह होता है। धृति मनुष्य की वह क्षमता है? जिसके कारण कार्य करने में कितने ही विघ्न और कठिनाइयाँ आने पर भी? मनुष्य साहस के साथ उनका सामना करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। वह प्रयत्नशील पुरुष सदा सफलता के मार्ग पर उत्साह के साथ आगे बढ़ता जाता है।सात्त्विक कर्ता का विशेष गुण है? कार्य की सिद्धिअसिद्धि में हर्ष शोकादि विकारों से मुक्त रहना। इस सन्दर्भ में? मुझे जिस उदाहरण का स्मरण होता है? वह चिकित्सालय में कार्य करती हुई लगनशील परिचारिका का है। उसे सामान्यत किसी रोगी से आसक्ति नहीं होती उसे यह अभिमान नहीं होता कि वह स्वयं रोगी का उपचार कर रही है? क्योंकि वस्तुत वह कार्य चिकित्सक का होता है। धैर्य और उत्साह के बिना वह अपने सेवा कार्य को सतत नहीं कर सकती। और उसी प्रकार? उसे उपचार की सफलता या विफलता के विषय में अनावश्यक चिन्ता नहीं होती। रोगी के स्वस्थ हो जाने अथवा उसकी मृत्यु हो जाने से वह परिचारिका अति हर्षित या अति दुखी नहीं हो जाती। वह जानती है कि चिकित्सालय तो सफलता और विफलता तथा जन्म और मृत्यु का क्षेत्र है। वह तटस्थ भाव से अपने सेवा कार्य में रत रहती है।उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष सात्त्विक कर्ता कहा जाता है। ऐसा पुरुष अपने कार्य क्षेत्र में अपनी समस्त क्षमताओं का सम्पूर्ण सदुपयोग करता है? क्योंकि आसक्ति आदि भावांे में उसकी शक्तियों का वृथा अपव्यय नहीं होता। स्वाभाविक ही है कि ऐसे सात्त्विक कर्ता को चिरस्थायी सफलता प्राप्त होती है और उसके कार्यों से जगत् का भी कल्याण होता है।सात्त्विक कर्ता को यह विवेक होता है कि शरीर? मन और बुद्धि उपाधियाँ चैतन्यस्वरूप आत्मा के सम्बन्ध से ही अपना कार्य करने में सक्षम होकर जगत् की सेवा कर सकती हैं। चैतन्य के बिना वे घर के एक कोने में रखी छड़ी की तरह असहाय रहती हैं।परमात्मा के पावन संकल्प की अभिव्यक्ति के लिए बुद्धि की क्षमता? हृदय का सौन्दर्य और शरीर की सार्मथ्य आदि सभी माध्यम हैं। अत? यदि इन उपाधियों में सामञ्जस्य न हो? तो आत्मा की अभिव्यक्ति अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं हो सकती। सात्त्विक कर्ता को अपने आत्मस्वरूप का सदैव भान बना रहता है।
English Translation By Swami Sivananda
An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is called Sattvic (pure).
Transliteration
muktasaṅgo'nahamvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ
siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyateअनुवाद
आसक्ति से रहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सफलता और असफलता में विकाररहित (हर्ष-शोक से मुक्त) कर्ता सात्त्विक कहा जाता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सात्त्विक कर्ता के लक्षणों का वर्णन करते हैं। सात्त्विक कर्ता वह है जो कर्म के फलों या कर्तापन के अभिमान से आसक्त नहीं होता। वह धैर्य और उत्साह के साथ अपना कर्तव्य करता है, और कार्य सिद्ध हो या न हो, दोनों ही परिस्थितियों में समभाव रहता है।
Translation
The doer who is free from attachment, free from egotism, endowed with fortitude and enthusiasm, and unperturbed by success or failure, is called sattvica (pure)
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a sattvica (pure) doer. Such a person performs actions without attachment to the results or egotistical pride. Endowed with patience and enthusiasm, they remain balanced and unaffected whether their efforts end in success or failure.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मुक्त-सङ्गः | आसक्ति से रहित |
| अनहंवादी | अहंकार के वचन न बोलने वाला (अहंकार-रहित) |
| धृति-उत्साह-समन्वितः | धैर्य और उत्साह से युक्त |
| सिद्धि-असिद्धयोः | सफलता और असफलता में |
| निर्विकारः | विकाररहित (हर्ष-शोक से मुक्त) |
| कर्ता | कर्म करने वाला |
| सात्त्विकः | सात्त्विक |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mukta-saṅgaḥ | free from attachment |
| anaham-vādī | free from egotistic speech (without ego) |
| dhṛti-utsāha-samanvitaḥ | endowed with fortitude and enthusiasm |
| siddhi-asiddhyoḥ | in success and failure |
| nirvikāraḥ | unaffected (without perturbation) |
| kartā | the doer |
| sāttvikaḥ | sattvica (pure) |
| ucyate | is said to be |