Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.23
मूल श्लोक :
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ हो? वह सात्त्विक कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
त्रिविध कर्मों में सात्त्विक कर्म सर्वश्रेष्ठ है? जो कर्ता के मन में शान्ति तथा उसके कर्मक्षेत्र में सामञ्जस्य उत्पन्न करता है। प्राय मनुष्य फल में आसक्त होकर अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष से प्रेरित होकर कर्म करता है। परन्तु यहाँ कहा गया है कि नियत अर्थात् कर्तव्य कर्म को अनासक्त भाव से तथा राग द्वेष से रहित होकर करने पर ही वह सात्त्विक कर्म कहलाता है। सात्त्विक पुरुष कर्म को इसीलिए करता है? क्योंकि कर्म कर्तव्य है और वही ईश्वर की पूजा है। ऐसी भावना और प्रेरणा से युक्त होने पर मनुष्य अपनी ही सामान्य कार्यकुशलता एवं श्रेष्ठता से कहीं अधिक ऊँचा उठ जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में राग और द्वेष का प्रश्न ही नहीं उठता।समस्त साधु सन्तों का सेवाकार्य इस तथ्य का प्रमाण है। अनेक अवसरों पर हम भी इसी भावना से कर्म करते हैं। ऐसा विशिष्ट उदाहरण? उस अवसर का है जब हमारे पैर में कोई चोट लग जाती है। उस समय हम झुक कर पैर को देखने लग जाते हैं और शरीर के समस्त अंग उसकी सेवा में जुट जाते हैं। इस सेवा कार्य में हम यह नहीं कह सकते कि हमें अपने पैर से अन्य अंगों की अपेक्षा अधिक प्रेम है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण शरीर में निवास करता है और उसके लिए शरीर के सभी अंग समान होते हैं।इसी प्रकार? जो सात्त्विक पुरुष एकमेव अद्वितीय? सच्चित्स्वरूप सर्वव्यापी परमात्मा को आत्मस्वरूप में पहचान लेता है? तो उस पुरुष के लिए कोढ़ी और राजकुमार? स्वस्थ और अस्वस्थ? दरिद्र और सम्पन्न ये सभी लोग अपने आध्यात्मिक शरीर के विभिन्न अंगों के समान ही प्रतीत होते हैं। ऐसा पुरुष अनुप्राणित आनन्द और कृतार्थता की भावना से जगत् की सेवा करता है।इस प्रकार? सात्त्विक कर्मों की पूर्णता उनके करने में ही होती है। फलप्राप्ति का विचार भी उसमें उत्पन्न नहीं होता है।
English Translation By Swami Sivananda
An action which is ordained, which is free from attachment, and which is done without love or hatred by one who is not desirous of any reward that action is declared to be Sattvic.
Transliteration
niyataṃ saṅgarahitamarāgadveṣataḥ kṛtam
aphala-prepsunā karma yat tat sāttvikam ucyateअनुवाद
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया गया हो, आसक्ति से रहित हो, और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले मनुष्य द्वारा किया गया हो, वह सात्त्विक कहलाता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सात्त्विक कर्म के लक्षणों को परिभाषित करते हैं। सात्त्विक कर्म वह है जो कर्तव्य समझकर, बिना किसी व्यक्तिगत राग-द्वेष के और बिना फल की आकांक्षा के किया जाता है। ऐसा कर्म कर्ता को बंधन में नहीं डालता बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
Translation
That action which is ordained by scripture, which is free from attachment, and which is performed without desire for its fruits by one who is free from likes and dislikes, is said to be of the nature of goodness
Meaning
In this verse, Lord Krishna defines the characteristics of a Sattvik (pure) action. An action is considered Sattvik when it is performed as a prescribed duty, without personal attachment, without likes or dislikes, and with no desire for its fruits. Such action does not bind the doer but leads to spiritual elevation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नियतम् | शास्त्र द्वारा नियत किया हुआ |
| सङ्ग-रहितम् | आसक्ति से रहित |
| अराग-द्वेषतः | राग और द्वेष के बिना |
| कृतम् | किया गया |
| अफल-प्रेप्सुना | फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा |
| कर्म | कर्म |
| यत् | जो |
| तत् | वह |
| सात्त्विकम् | सात्त्विक |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| niyatam | ordained by scriptures |
| saṅga-rahitam | free from attachment |
| arāga-dveṣataḥ | without attachment or aversion |
| kṛtam | done |
| aphala-prepsunā | by one who does not desire the fruit |
| karma | action |
| yat | which |
| tat | that |
| sāttvikam | sattvik (in the mode of goodness) |
| ucyate | is said to be |