श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.22

मूल श्लोक :

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।18.22।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।18.22।।किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित? वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है? वह तामस कहा गया है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

।।18.22।। तमोगुण के आधिक्य से अभिभूत बुद्धि किसी एक परिच्छिन्न कार्य में इस प्रकार आसक्त होती है मानो वह कार्य ही सम्पूर्ण सत्य हो। वह कभी कारण का विचार ही नहीं करती। तामसिक लोगों का यह ज्ञान अत्यन्त निम्नस्तरीय है। प्राय ऐसे लोग कट्टरवादी तथा अपने धर्म? भक्ति? जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों के विषय में अत्यन्त हठवादी होते हैं। वे जगत् का तथा अन्य घटनाओं के कारण का कभी अन्वेषण नहीं करते हैं। श्री शंकराचार्य कहते हैं कि इनका ज्ञान निर्युक्तिक होता है अर्थात् किसी प्रामाणिक युक्ति पर आश्रित नहीं होता।ऐसी भ्रमित कट्टरवादी और पूर्वाग्रहों से युक्त बुद्धि के द्वारा अवलोकन करते हुए तामसी लोग जगत् को कभी यथार्थ रूप में नहीं देख पाते। इतना ही नहीं? वरन् वे अपनी कल्पनाओं को जगत् पर थोपकर उसे सर्वथा विपरीत रूप में भी देखते हैं। वास्तव में? तमोगुणी लोग जगत् को मात्र अपने भोग का विषय ही मानते हैं। वे विश्व के अधिष्ठान परमात्मा की सर्वथा उपेक्षा करते हैं। मान और दम्भ के कारण उनका ज्ञान संकुचित होता है।सारांशत? द्वैतप्रपंच को देखते हुए उसके अद्वैत स्वरूप को पहचानना सात्त्विक ज्ञान है नामरूपमय सृष्टि के भेदों को ही देखना और उन्हें सत्य मानना राजस ज्ञान है और अपूर्ण को ही पूर्ण मानना तामस ज्ञान है।हमें इसका विस्मरण नहीं होना चाहिए कि पूर्वोक्त तथा आगे भी कथनीय त्रिविध वर्गीकरण का प्रयोजन अन्य लोगों के विश्लेषण के लिए न होकर? आत्मनिरीक्षण के लिए हैं। साधक को समयसमय पर स्वयं का मूल्यांकन करते रहना चाहिए।अब? कर्म की त्रिविधता का वर्णन करते हैं

English Translation By Swami Sivananda

18.22 But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without foundation in Truth, and trivial  that is declared to be Tamasic.