Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.2
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कलाता है और समस्त कर्मों का फलत्याग त्याग कहा जाता हा। शास्त्रीय सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को इन दोनों में कोई अन्तर नहीं ज्ञात होता? क्योंकि कामना सदैव फलप्राप्ति की ही होती है। अत? कामना प्रेरित कर्मों का त्याग और कर्मफल की आसक्ति का त्याग ये दोनों ही समान प्रतीत होते हैं। इसका कारण शास्त्रों से अनभिज्ञता अथवा उनका सतही अध्ययन ही हो सकता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि दोनों का अर्थ कामना का त्याग ही है? परन्तु त्याग और संन्यास में कुछ अन्तर है। फिर भी त्याग? संन्यास का अविभाज्य अंग है। मनुष्य वर्तमान में कर्म करता है और आशा करता है कि उसे इष्टफल भविष्य में प्राप्त होगा। वर्तमान के कर्म का परिणाम ही भावी फल है। इसलिए? निष्काम कर्म वर्तमान में ही हो सकते हैं? जब कि फलभोग की चिन्ता से उत्पन्न होने वाली मन की व्याकुलता का संबंध भविष्य काल से होता है। वर्तमान के कर्म की परिसमाप्ति भावी फल में होती है। कामना और विक्षेप मन में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। कामना जितनी अधिक तीव्र होगी? उतनी ही अधिक मात्रा में हमारी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास होगा और ऐसा शक्तिहीन पुरुष किसी भी कर्म को कुशलता एवं उत्साह के साथ सम्पादित नहीं कर सकता। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार या जीव ही इच्छा करता है। अत? अहंकार की निवृत्ति का अर्थ है? व्यष्टि जीव की विरति और उस साधक की अपने सर्वोच्च स्वरूप में दृढ़ स्थिति।कर्म वर्तमान में होते हैं और उनके फल भविष्य में प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। जो व्यक्ति फल की चिन्ता करता है वह वर्तमान में कार्य करने की अपनी क्षमता खो देता है। स्वाभाविक ही है कि उस व्यक्ति को इष्ट फल मिलने की सम्भावना कम हो जाती है? क्योंकि कर्म का फल कर्ता के प्रयत्न तथा प्रकृति के नियमादि अन्य कई कारणों पर निर्भर करता है। अत हमें फलासक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया जाता है।संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि त्याग साधन है और संन्यास साध्य है। त्याग और संन्यास की साधना का संबंध हमारे कर्मों से है। भगवान् श्रीकृष्ण कर्म के महत्त्व पर बल देते हुए कभी नहीं थकते। इन दोनों शब्दों में से कोई भी यह नहीं दर्शाता है कि हमको कर्म की उपेक्षा करनी चाहिए। इसके विपरीत? दोनों का आग्रह कर्म के पालन पर ही है। हमको कर्म करने ही चाहिए। तथापि? ये कर्म अहंकार और स्वार्थ या फलासक्ति से रहित होने चाहिए। फलासक्ति ही हमारी कार्यकुशलता में बाधक बनती है। फलासक्ति के अभाव में हमारे कर्म हमें अपना पूर्ण पुरस्कार प्रदान कर सकते हैं। हम कह सकते हैं कि वेदों में प्रयुक्त इन दो शब्दों के अर्थों की अपेक्षा गीता में दी गई इनकी परिभाषाएं अधिक उदार एवं सहिष्णु हैं।अज्ञानी पुरुष को कर्म करने चाहिए या नहीं इस पर कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said The sages understand Sannyasa to be the renunciation of action with desire; the wise declare the abandonment of the fruits of all actions as Tyaga.
Transliteration
śrī-bhagavān uvāca
kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ
sarva-karma-phala-tyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — कामनायुक्त कर्मों के त्याग को विद्वान जन संन्यास समझते हैं और सब कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के संन्यास और त्याग के विषय में पूछे गए प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कामनाओं से प्रेरित कर्मों को पूरी तरह से छोड़ देना संन्यास कहलाता है। दूसरी ओर, अपने सभी नियत कर्मों को करते हुए उनके फलों की इच्छा का त्याग करना त्याग कहलाता है।
Translation
The Blessed Lord said: The sages understand ‘sannyasa’ to be the renunciation of desire-driven actions, and the wise declare ’tyaga’ to be the abandonment of the fruits of all actions
Meaning
In this verse, Lord Krishna addresses Arjuna’s query regarding the distinction between ‘sannyasa’ (renunciation) and ’tyaga’ (abandonment). He explains that sages define ‘sannyasa’ as the giving up of actions motivated by desire. Meanwhile, ’tyaga’ is defined by the wise as performing one’s duties but relinquishing all attachment to their results.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रीभगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | ने कहा |
| काम्यानाम् | कामनायुक्त |
| कर्मणाम् | कर्मों के |
| न्यासम् | त्याग को |
| संन्यासम् | संन्यास |
| कवयः | विद्वान जन |
| विदुः | जानते हैं |
| सर्व-कर्म-फल-त्यागम् | सब कर्मों के फलों के त्याग को |
| प्राहुः | कहते हैं |
| त्यागम् | त्याग |
| विचक्षणाः | बुद्धिमान लोग |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī-bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| kāmyānām | of desire-driven |
| karmaṇām | of activities |
| nyāsam | renunciation |
| saṃnyāsam | the renounced order of life (sannyasa) |
| kavayaḥ | the sages |
| viduḥ | understand |
| sarva-karma-phala-tyāgam | the giving up of the fruits of all activities |
| prāhuḥ | call |
| tyāgam | renunciation (tyaga) |
| vicakṣaṇāḥ | the experienced/wise |